Friday, 12 July 2013

योग्य उम्मीदवार कौन

ग्रीस के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। बचपन से ही उसे पढ़ने और नई चीजें सीखने का बड़ा शौक था। अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर वह कम उम्र में ही बड़ा विद्वान बन गया। एक बार उसे पता चला कि राज्य में प्रशासनिक कार्य करने के लिए तीन सौ जगहें खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था, इसलिए उसने तुरंत अर्जी भेज दी। योग्य तो वह था ही। उसका साक्षात्कार भी संतोषजनक हुआ था। लेकिन जब नतीजा निकला तो मालूम पड़ा कि पिडार्टस को नौकरी के लिए नहीं चुना गया था। जब उसके मित्रों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इससे पिडार्टस बहुत दुखी हो गया होगा, इसलिए वे सब मिलकर उसे सांत्वना देने उसके घर पहुंचे। सभी अपनी-अपनी भावनाओं के अनुरूप उसे दिलासा दे रहे थे। पिडार्टस ने मित्रों की बात सुनी और हंसते-हंसते कहने लगा- मित्रों, इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे तो यह जानकर खुशी हुई है और गर्व भी कि अपने राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले तीन सौ मनुष्य हैं। मेरा राज्य विद्वानों एवं योग्य पुरुषों से भरा पड़ा है। इसके बाद भी उसके कई दोस्त शांत नहीं हुए। वे कहने लगे कि जरूर कोई गड़बड़ी हुई है। पिडार्टस का चयन होना चाहिए था। तब पिटाडर्स ने उन्हें समझाते हुए कहा-इस संसार में अनगिनत विशिष्ट लोग भरे पड़े हैं। योग्यता की सीमा नहीं होती। पर हम औरों को नीचा व अपने को ऊंचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए हमें संतोष रखना चाहिए लेकिन आगे बढ़ने का प्रयास भी करते रहना चाहिए। 

शिखर का सच

गुरु ज्ञानानंद के गुरुकुल में कई शिष्य शिक्षा प्राप्त करते थे। एक दिन ज्ञानानंद के एक प्रिय शिष्य विक्रांत ने उनसे कहा, 'गुरुजी, मैंने इस गुरुकुल में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया है। लेकिन मुझे पेड़ पर चढ़ना नहीं आता। मेरा पेड़ पर चढ़ने का बहुत मन करता है लेकिन मुझे लगता है कि यदि मैं पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करूंगा तो गिर जाऊंगा।'

गुरु बोले, 'यदि तुम पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करोगे तो मेरा विश्वास है कि तुम नहीं गिरोगे।' इसके बाद उन्होंने विक्रांत को एक बड़े पेड़ के आखिरी सिरे तक चढ़ने के लिए कहा। विक्रांत संभल-संभल कर पेड़ पर चढ़ने लगा। गुरु ने उसे कुछ भी नहीं कहा। आखिर वह संभल-संभल कर चढ़ गया। जैसे ही वह पेड़ से उतरने लगा तो गुरु बार-बार जोर-जोर से कहने लगे, 'बेटा, संभल कर उतरो।' विक्रांत उतरते समय गुरु के निर्देशों को सुनकर हैरान रह गया।

उतरकर उसने पूछा, 'गुरुजी, जब मैं पेड़ पर चढ़ रहा था तो उस समय मुझे आपके निर्देशों की आवश्यकता थी लेकिन तब आप कुछ नहीं बोले जबकि उतरते समय मार्गदर्शन करने लगे जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी।' इस पर गुरु मुस्कराते हुए बोले, 'पेड़ पर चढ़ते समय तुम स्वयं सावधान थे इसलिए मुझे कुछ कहने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। लेकिन चढ़ जाने के बाद तुम अति आत्मविश्वास से भर गए इसलिए मैंने तुम्हें सावधान किया। जीवन में भी ऐसा ही होता है। शिखर पर पहुंचकर लोग अति आत्मविश्वास का शिकार हो जाते हैं इसलिए उनके शिखर से गिरने की आशंका अधिक होती हैं। जबकि शिखर पर भी विनम्र रहने वाले कभी नहीं गिरते।'

कबीर के बेटे कमाल की परीक्षा

कबीर के बेटे कमाल ने भी अपने पिता के रास्ते पर चलते हुए अपना जीवन ईश्वर की उपासना में समर्पित कर दिया था। वह एक झोंपड़ी में रहते हुए दिन-रात प्रभु की आराधना करते थे। एक दिन काशी नरेश को किसी ने बताया कि कमाल भी कबीर की ही तरह लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि से दूर हैं। उन्हें केवल लोगों के दुख-दर्द दूर करने में आनंद मिलता है और वह कीमती से कीमती भेंट को भी तुच्छ समझते हैं।

काशी नरेश यह जानने के लिए कमाल के पास आए और कुछ बातें की। फिर उन्हें एक बहुमूल्य अंगूठी भेंट करते हुए बोले, 'आपने मुझे ज्ञान के अनमोल मोती प्रदान किए हैं। मैं एक छोटी सी भेंट आपको दक्षिणा में देना चाहता हूं।' कमाल ने अंगूठी की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा और बोले, 'यदि आपके मन में दक्षिणा देने की इच्छा है तो यहीं कहीं इस भेंट को छोड़ दें।'

कमाल की बात सुनकर काशी नरेश ने अंगूठी झोंपड़ी के छप्पर पर रख दी और वहां से चले गए। उन्होंने सोचा, भला कोई भी व्यक्ति कीमती अंगूठी की ओर नजर भी न मारे ऐसा कैसे हो सकता है? यह सोच कर वह अगले दिन फिर कमाल के पास पहुंचे। कमाल हंसकर बोले, 'आइए महाराज। आज क्या भेंट लाए हैं?' यह जवाब सुनकर काशी नरेश को अत्यंत हैरानी हुई। वह बोले, 'आज तो मैं कल भेंट की हुई अंगूठी वापस लेने आया हूं। कहां है वह अंगूठी?'


इस पर कमाल बोले, 'मुझे क्या पता। आप जहां छोड़ कर गए होंगे वहीं होगी, मुझे तो उसकी आवश्यकता नहीं थी।' यह सुनकर काशी नरेश ने छप्पर पर हाथ बढ़ाया तो अंगूठी को वहीं पाकर चकित रह गए। वह कमाल के पैरों में गिर पडे़ और बोले, 'ऐसी विरक्ति मेरे अंदर भी ला दें ताकि मैं भी अपने जन्म को सफल कर सकूं।' कमाल ने उन्हें लाभ-लोभ से मुक्त होकर राजकाज चलाने की सलाह दी।

राजा भोज की उदारता

राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई और आदतन अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राज पुरोहित से पूछा- यह ऐसा क्यों कर रही है? राज पुरोहित ने जवाब दिया- राजन् यह कह रही है कि आप जैसे लक्ष्मीपतियों को धन संचय नहीं करना चाहिए।

मैंने भी कितनी मेहनत से अपने छत्ते में शहद एकत्रित किया मगर मैं उसका उपयोग नहीं कर पाई और न ही किसी को दान दिया। इसे दूसरों ने लूट लिया। आप भी अपने धन का सदुपयोग करते हुए दान देना प्रारंभ करें। राजा भोज ने इस बात को काफी गंभीरता से लिया। वह उसी दिन से विद्वानों और निर्धनों को खुलकर दान करने लगे।

उनकी इस उदारता से चिंतित होकर राज्य के कोषाध्यक्ष ने राजकोष के द्वार पर लिखवा दिया-राजा को आपात काल के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिए। जब राजा भोज की उस पंक्ति पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसके नीचे लिखवा दिया-जिन पर लक्ष्मी की कृपा हो उन पर विपत्ति कैसी?

कोषाध्यक्ष ने फिर लिखवा दिया-कभी-कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती है।

भोज ने इसे पढ़कर लिखवाया- यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है तो एकत्र किया हुआ धन भी नष्ट हो सकता है। राजा भोज के इस तर्क का कोई उत्तर कोषाध्यक्ष को नहीं सूझा।

उस दिन से उसने कुछ भी लिखवाना बंद कर दिया। दान का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह आगे भी चलता रहा। ऐसा करके भोज ने प्रजा के हृदय में अपने लिए एक विशेष जगह बना ली।

विश्वास की ताकत

एक अंग्रेज अफसर अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ जहाज में सवार होकर सफर पर निकला। रास्ते में समुद्र में जोर का तूफान आया। मुसाफिर घबरा उठे। पर वह अंग्रेज अफसर जरा भी नहीं घबराया। उसकी पत्नी भी व्याकुल हो गई थी। उसने अपने पति से पूछा-इतना खतरनाक तूफान आया है। सबकी हालत खराब है। पर आप इतना निश्चिंत कैसे बैठे हैं?

यह सुनते ही उस अफसर ने म्यान से तलवार निकाली और पत्नी के सिर पर रखकर पूछा- क्या तुम्हें डर लग रहा है? पत्नी बोली-मेरी बात का जवाब न देकर आप यह क्या खेल कर रहे हैं? अफसर ने फिर पूछा-बताओ, तुम्हें डर लग रहा है या नहीं? पत्नी ने कहा- मुझे भला क्यों डर लगेगा? मुझे पता है आप मेरी जान नहीं लेंगे क्योंकि आप मेरे दुश्मन नहीं हैं। आप तो मुझे अपनी जान से ज्यादा चाहते हैं। फिर मैं क्यों डरूं?

इस पर अफसर ने कहा-बिल्कुल सही। जिस तरह तुम्हें मुझ पर भरोसा है उसी तरह मुझे ईश्वर पर भरोसा है। वह हम सब का अभिभावक है। वह हमारा बुरा क्यों चाहेगा? वह तो हमारे पिता के समान है। वह हर संकट में हमारी सहायता ही करेगा। इसलिए तूफान आया है तो वह चला भी जाएगा। जीवन में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। इससे हमें बड़ी ताकत मिलती है। हम इसी ताकत के सहारे जीते हैं। इसलिए हमें किसी न किसी के प्रति विश्वास तो रखना ही होगा। वही लोग घबराते हैं या अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते हैं जिनमें विश्वास की कमी होती है। संयोग से उसी समय तूफान थम गया।

एक अनोखा फैसला

चीन का दार्शनिक लाओत्से अपने विचार और बुद्धि के कारण काफी प्रसिद्ध था। चीन के राजा ने लाओत्से से प्रधान न्यायाधीश बनने का अनुरोध किया और कहा- संपूर्ण विश्व में आप जैसा बुद्धिमान और न्यायप्रिय कोई नहीं है। आप न्यायाधीश बन जाएंगे तो मेरा राज्य आदर्श राज्य बन जाएगा। लाओत्से ने इनकार करते हुए कहा कि वह उस पद के लिए उपयुक्त नहीं है। लेकिन राजा नहीं माना।

लाओत्से ने उसे समझाया- मुझे न्यायालय में एक दिन कार्य करते देखकर आपको अपना विचार बदलना पड़ेगा। मेरा मानना है कि संपूर्ण व्यवस्था में ही दोष है। आपके प्रति आदर भाव रखने के कारण ही मैंने आपसे सत्य नहीं कहा है। अब या तो मैं न्यायाधीश बना रहूंगा या आपके राज्य की कानून-व्यवस्था बनी रहेगी। देखें, क्या होता है।

पहले ही दिन न्यायालय में एक चोर को लाया गया जिसने राज्य के सबसे धनी व्यक्ति का लगभग आधा धन चुरा लिया था। लाओत्से ने मामले को अच्छे से सुना और अपना निर्णय सुनाया- चोर और धनी व्यक्ति, दोनों को छह-छह महीने की जेल की सजा दी जाए। धनी व्यक्ति ने कहा- आप यह क्या कर रहे हैं? चोरी मेरे घर में हुई है! मेरा धन चुरा लिया गया है, फिर भी आप मुझे जेल भेजने का निर्णय कर रहे हैं। यह कैसा न्याय है?


लाओत्से ने कहा- मुझे तो लगता है कि मैंने चोर के प्रति न्याय नहीं किया है। तुम्हें वास्तव में अधिक लंबा कारावास देने की आवश्यकता है। क्योंकि तुमने आवश्यकता से अधिक धन जमा करके बहुत से लोगों को संपत्ति से वंचित कर दिया है! देश में हजारों लोग भूखे मर रहे हैं लेकिन धन संग्रह करने की तुम्हारी लालसा कम नहीं होती। तुम्हारे लालच के कारण ही ऐसे चोर पैदा हो रहे हैं। अपने घर में होने वाली चोरी के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। तुम अधिक बड़े अपराधी हो। राजा ने लाओत्से को उसी दिन हटा दिया।

शायर की उदारता

प्रख्यात शायर जिगर मुरादाबादी बहुत ही उदार और दयालु थे। किसी की मदद करने का कोई मौका वह छोड़ते नहीं थे। अपने इस स्वभाव के चलते वह काफी लोकप्रिय थे और लोग उन्हें सम्मान देते थे। एक बार वह अपने एक मित्र के साथ कहीं जा रहे थे। जिगर साहब के दोस्त ने देखा कि एक शख्स उन्हें देख कर आंखें चुरा रहा है और मुंह छुपाने की कोशिश कर रहा है। दोस्त ने कहा-हजरत! माजरा क्या है? वह आदमी आपको देखकर इस तरह झेंप क्यों रहा था? और आंखें क्यों चुरा रहा था? अगर वह आपको जानता था तो सामने क्यों नहीं आया। दुआ सलाम करता। और जनाब आप भी कुछ नहीं बोले। आप उसे जानते हैं क्या? 

जिगर मुरादाबादी बोले- अच्छी तरह जनता हूं उसे। हकीकत यह है कि एक दिन इस आदमी ने मेरी जेब से पैसे चुराए थे इसलिए मुझे पहचान कर झेंप रहा था। इस पर मित्र ने कहा- जब तुम्हें पता चल गया कि यह वही है तो तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? मैं उसकी खबर लेता। तुम तो बड़े आराम से देख रहे थे। 

जिगर मुरादाबादी ने हंसकर कहा- अरे भाई, उसकी खबर लेने के लिए मैं गया था उसके घर। पर वहां जो देखा उसे बयान करना मुश्किल है। क्या बताऊं, उसके घर की हालत बेहद खराब थी। उसके बीवी-बच्चों के पास खाने को कुछ नहीं था। अब तुम ही बताओ मैं क्या करता। मैं चुपचाप वहां से लौट आया। जिगर मुरादाबादी का दोस्त यह सुनकर अवाक रह गया। उसके भीतर मुरादाबादी के लिए इज्जत थोड़ी और बढ़ गई।