Friday, 12 July 2013

प्रजा का हित

एक बार राजा रघु के दरबार में इस बात पर विचार चल रहा था कि राजकोष का उपयोग किसके लिए किया जाए। एक विचार यह था कि सैन्य शक्ति बढ़ाई जाए ताकि न केवल राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो बल्कि क्षेत्र विस्तार की योजना भी आगे बढ़े। इस पर जो खर्च पड़ेगा वह पराजित देशों से मिलने वाले कर से पूरा हो सकेगा।

दूसरा विचार यह उभरकर आया- राजकोष का उपयोग जन कल्याण के लिए होना चाहिए। प्रजा का स्तर उठाने में राजकोष खाली कर दिया जाए। सुखी, संतुष्ट, साहसी और संभावनाशील नागरिकों में से प्रत्येक एक दुर्ग होता है। उन्हें जीतना किसी शत्रु के लिए संभव नहीं। इस प्रकार युद्ध में क्षेत्र जीतने की अपेक्षा मैत्री का विस्तार कहीं अधिक लाभदायक है। उससे स्वेच्छा, सहयोग और अपनत्व की ऐसी उपलब्धियां प्राप्त होती है, जिनके कारण छोटा देश भी चक्रवर्ती स्तर का बन सकता हे। दोनों पक्षों के विमर्श चलते रहे। खूब गर्मागर्म बहस हुई। दोनों पक्ष ने जोरदार दलीलें दीं।

अंतिम निर्णय राजा को करना था। सब उत्सुक थे कि वे क्या कहते हैं? राजा रघु ने कहा- युद्ध पीढ़ियों से लड़े जाते रहे हैं। उनके कड़वे, मीठे परिणाम भी स्मृति पटल पर अंकित हैं। इस बार युद्ध के प्रयोजनों की उपेक्षा कर लोक मंगल की परिणति को परखा जाए और समस्त संपत्ति जन कल्याण की योजनाओं में खर्च कर दी जाए। कुछ लोगों को यह अटपटा लगा लेकिन राजा का आदेश था। वैसा ही किया गया।

धीरे-धीरे प्रजाजन हर दृष्टि से समुन्नत हो गए। पड़ोसी राज्यों को समाचार मिले तो उनके हौसले टूट गए। आक्रमण की चर्चाएं समाप्त हो गई। सुख शांति के समाचार पा कर अन्य देशों के समर्थ लोग वहां आ कर बसने लगे। बंजर भूमि सोना उगलने लगी और उत्साही प्रजाजन ने अपने राज्य को ऐसा बना दिया, जिसके कारण अयोध्या अन्य राज्यों की तुलना में विशिष्ट बन गया।

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