बांग्ला के प्रसिद्ध कवि-नाटककार गिरीशचन्द्र घोष के एक रईस मित्र थे। वे अपनी रईसी अपने व्यवहार में भी दिखाते रहते थे। जैसे वह कहीं भी जाते तो उनका नौकर उनके लिए चांदी के बर्तन साथ लेकर चलता था। वे अपना खाना उसी में खाते थे। घोष महाशय को यह बात अखरती थी। पर वह मित्र का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। फिर भी उन्होंने तय किया कि वह उसकी आदतों को सुधार कर रहेंगे। एक दिन घोष महाशय ने दावत दी और अपने उस रईस दोस्त को भी बुलाया।
हमेशा की तरह उनके मित्र अपने नौकर के साथ पहुंचे। नौकर बर्तन लेकर आया था। लेकिन घोष महाशय अपने मित्र के आते ही उन्हें और लोगों के बीच ले गए। जब तक मित्र कुछ समझ पाते तब तक उनके सामने पत्तल में खाना परोस दिया गया। बाकी लोगों के सामने भी पत्तल में खाना रखा था। मित्र संकोच में पड़ गए। उन्होंने नौकर को आवाज देना चाहा लेकिन तब तक सब लोग खाने लगे और उनसे भी खाने का अनुरोध करने लगे।
बेचारे को उनके साथ पत्तल में खाना पड़ा। खाने के बाद ज्यों ही वे उठे, घोष महाशय उनके बर्तनों में व्यंजन लेकर उनके सामने हाजिर हुए। उन्होंने हंसते हुए मित्र से कहा-थोड़ी गलतफहमी हो गई थी। जब तुम्हारे नौकर को घर की महिलाओं ने बर्तन लेकर आते देखा तो उन्हें लगा कि शायद तुम अपने बच्चों के लिए खाना ले जाना चाहते हो। उन्होंने इसमें खाना दे दिया है। मित्र लज्जित होकर चले गए। उन्हें गलती का अहसास हो गया। उन्होंने प्रदर्शन करना छोड़ दिया।
हमेशा की तरह उनके मित्र अपने नौकर के साथ पहुंचे। नौकर बर्तन लेकर आया था। लेकिन घोष महाशय अपने मित्र के आते ही उन्हें और लोगों के बीच ले गए। जब तक मित्र कुछ समझ पाते तब तक उनके सामने पत्तल में खाना परोस दिया गया। बाकी लोगों के सामने भी पत्तल में खाना रखा था। मित्र संकोच में पड़ गए। उन्होंने नौकर को आवाज देना चाहा लेकिन तब तक सब लोग खाने लगे और उनसे भी खाने का अनुरोध करने लगे।
बेचारे को उनके साथ पत्तल में खाना पड़ा। खाने के बाद ज्यों ही वे उठे, घोष महाशय उनके बर्तनों में व्यंजन लेकर उनके सामने हाजिर हुए। उन्होंने हंसते हुए मित्र से कहा-थोड़ी गलतफहमी हो गई थी। जब तुम्हारे नौकर को घर की महिलाओं ने बर्तन लेकर आते देखा तो उन्हें लगा कि शायद तुम अपने बच्चों के लिए खाना ले जाना चाहते हो। उन्होंने इसमें खाना दे दिया है। मित्र लज्जित होकर चले गए। उन्हें गलती का अहसास हो गया। उन्होंने प्रदर्शन करना छोड़ दिया।
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