Friday, 12 July 2013

योग्य उम्मीदवार कौन

ग्रीस के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। बचपन से ही उसे पढ़ने और नई चीजें सीखने का बड़ा शौक था। अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर वह कम उम्र में ही बड़ा विद्वान बन गया। एक बार उसे पता चला कि राज्य में प्रशासनिक कार्य करने के लिए तीन सौ जगहें खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था, इसलिए उसने तुरंत अर्जी भेज दी। योग्य तो वह था ही। उसका साक्षात्कार भी संतोषजनक हुआ था। लेकिन जब नतीजा निकला तो मालूम पड़ा कि पिडार्टस को नौकरी के लिए नहीं चुना गया था। जब उसके मित्रों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इससे पिडार्टस बहुत दुखी हो गया होगा, इसलिए वे सब मिलकर उसे सांत्वना देने उसके घर पहुंचे। सभी अपनी-अपनी भावनाओं के अनुरूप उसे दिलासा दे रहे थे। पिडार्टस ने मित्रों की बात सुनी और हंसते-हंसते कहने लगा- मित्रों, इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे तो यह जानकर खुशी हुई है और गर्व भी कि अपने राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले तीन सौ मनुष्य हैं। मेरा राज्य विद्वानों एवं योग्य पुरुषों से भरा पड़ा है। इसके बाद भी उसके कई दोस्त शांत नहीं हुए। वे कहने लगे कि जरूर कोई गड़बड़ी हुई है। पिडार्टस का चयन होना चाहिए था। तब पिटाडर्स ने उन्हें समझाते हुए कहा-इस संसार में अनगिनत विशिष्ट लोग भरे पड़े हैं। योग्यता की सीमा नहीं होती। पर हम औरों को नीचा व अपने को ऊंचा दिखाने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए हमें संतोष रखना चाहिए लेकिन आगे बढ़ने का प्रयास भी करते रहना चाहिए। 

शिखर का सच

गुरु ज्ञानानंद के गुरुकुल में कई शिष्य शिक्षा प्राप्त करते थे। एक दिन ज्ञानानंद के एक प्रिय शिष्य विक्रांत ने उनसे कहा, 'गुरुजी, मैंने इस गुरुकुल में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया है। लेकिन मुझे पेड़ पर चढ़ना नहीं आता। मेरा पेड़ पर चढ़ने का बहुत मन करता है लेकिन मुझे लगता है कि यदि मैं पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करूंगा तो गिर जाऊंगा।'

गुरु बोले, 'यदि तुम पेड़ पर चढ़ने का प्रयास करोगे तो मेरा विश्वास है कि तुम नहीं गिरोगे।' इसके बाद उन्होंने विक्रांत को एक बड़े पेड़ के आखिरी सिरे तक चढ़ने के लिए कहा। विक्रांत संभल-संभल कर पेड़ पर चढ़ने लगा। गुरु ने उसे कुछ भी नहीं कहा। आखिर वह संभल-संभल कर चढ़ गया। जैसे ही वह पेड़ से उतरने लगा तो गुरु बार-बार जोर-जोर से कहने लगे, 'बेटा, संभल कर उतरो।' विक्रांत उतरते समय गुरु के निर्देशों को सुनकर हैरान रह गया।

उतरकर उसने पूछा, 'गुरुजी, जब मैं पेड़ पर चढ़ रहा था तो उस समय मुझे आपके निर्देशों की आवश्यकता थी लेकिन तब आप कुछ नहीं बोले जबकि उतरते समय मार्गदर्शन करने लगे जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी।' इस पर गुरु मुस्कराते हुए बोले, 'पेड़ पर चढ़ते समय तुम स्वयं सावधान थे इसलिए मुझे कुछ कहने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। लेकिन चढ़ जाने के बाद तुम अति आत्मविश्वास से भर गए इसलिए मैंने तुम्हें सावधान किया। जीवन में भी ऐसा ही होता है। शिखर पर पहुंचकर लोग अति आत्मविश्वास का शिकार हो जाते हैं इसलिए उनके शिखर से गिरने की आशंका अधिक होती हैं। जबकि शिखर पर भी विनम्र रहने वाले कभी नहीं गिरते।'

कबीर के बेटे कमाल की परीक्षा

कबीर के बेटे कमाल ने भी अपने पिता के रास्ते पर चलते हुए अपना जीवन ईश्वर की उपासना में समर्पित कर दिया था। वह एक झोंपड़ी में रहते हुए दिन-रात प्रभु की आराधना करते थे। एक दिन काशी नरेश को किसी ने बताया कि कमाल भी कबीर की ही तरह लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि से दूर हैं। उन्हें केवल लोगों के दुख-दर्द दूर करने में आनंद मिलता है और वह कीमती से कीमती भेंट को भी तुच्छ समझते हैं।

काशी नरेश यह जानने के लिए कमाल के पास आए और कुछ बातें की। फिर उन्हें एक बहुमूल्य अंगूठी भेंट करते हुए बोले, 'आपने मुझे ज्ञान के अनमोल मोती प्रदान किए हैं। मैं एक छोटी सी भेंट आपको दक्षिणा में देना चाहता हूं।' कमाल ने अंगूठी की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा और बोले, 'यदि आपके मन में दक्षिणा देने की इच्छा है तो यहीं कहीं इस भेंट को छोड़ दें।'

कमाल की बात सुनकर काशी नरेश ने अंगूठी झोंपड़ी के छप्पर पर रख दी और वहां से चले गए। उन्होंने सोचा, भला कोई भी व्यक्ति कीमती अंगूठी की ओर नजर भी न मारे ऐसा कैसे हो सकता है? यह सोच कर वह अगले दिन फिर कमाल के पास पहुंचे। कमाल हंसकर बोले, 'आइए महाराज। आज क्या भेंट लाए हैं?' यह जवाब सुनकर काशी नरेश को अत्यंत हैरानी हुई। वह बोले, 'आज तो मैं कल भेंट की हुई अंगूठी वापस लेने आया हूं। कहां है वह अंगूठी?'


इस पर कमाल बोले, 'मुझे क्या पता। आप जहां छोड़ कर गए होंगे वहीं होगी, मुझे तो उसकी आवश्यकता नहीं थी।' यह सुनकर काशी नरेश ने छप्पर पर हाथ बढ़ाया तो अंगूठी को वहीं पाकर चकित रह गए। वह कमाल के पैरों में गिर पडे़ और बोले, 'ऐसी विरक्ति मेरे अंदर भी ला दें ताकि मैं भी अपने जन्म को सफल कर सकूं।' कमाल ने उन्हें लाभ-लोभ से मुक्त होकर राजकाज चलाने की सलाह दी।

राजा भोज की उदारता

राजा भोज एक दिन भोजन कर रहे थे कि तभी एक मधुमक्खी उनके पास आकर बैठ गई और आदतन अपने हाथ-पैर रगड़ते हुए उन्हें सिर पर लगाने लगी। भोज ने राज पुरोहित से पूछा- यह ऐसा क्यों कर रही है? राज पुरोहित ने जवाब दिया- राजन् यह कह रही है कि आप जैसे लक्ष्मीपतियों को धन संचय नहीं करना चाहिए।

मैंने भी कितनी मेहनत से अपने छत्ते में शहद एकत्रित किया मगर मैं उसका उपयोग नहीं कर पाई और न ही किसी को दान दिया। इसे दूसरों ने लूट लिया। आप भी अपने धन का सदुपयोग करते हुए दान देना प्रारंभ करें। राजा भोज ने इस बात को काफी गंभीरता से लिया। वह उसी दिन से विद्वानों और निर्धनों को खुलकर दान करने लगे।

उनकी इस उदारता से चिंतित होकर राज्य के कोषाध्यक्ष ने राजकोष के द्वार पर लिखवा दिया-राजा को आपात काल के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिए। जब राजा भोज की उस पंक्ति पर नजर पड़ी तो उन्होंने उसके नीचे लिखवा दिया-जिन पर लक्ष्मी की कृपा हो उन पर विपत्ति कैसी?

कोषाध्यक्ष ने फिर लिखवा दिया-कभी-कभी दुर्भाग्य से धनवानों पर भी विपत्ति आ सकती है।

भोज ने इसे पढ़कर लिखवाया- यदि दुर्भाग्य से धनवानों पर विपत्ति आ सकती है तो एकत्र किया हुआ धन भी नष्ट हो सकता है। राजा भोज के इस तर्क का कोई उत्तर कोषाध्यक्ष को नहीं सूझा।

उस दिन से उसने कुछ भी लिखवाना बंद कर दिया। दान का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह आगे भी चलता रहा। ऐसा करके भोज ने प्रजा के हृदय में अपने लिए एक विशेष जगह बना ली।

विश्वास की ताकत

एक अंग्रेज अफसर अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ जहाज में सवार होकर सफर पर निकला। रास्ते में समुद्र में जोर का तूफान आया। मुसाफिर घबरा उठे। पर वह अंग्रेज अफसर जरा भी नहीं घबराया। उसकी पत्नी भी व्याकुल हो गई थी। उसने अपने पति से पूछा-इतना खतरनाक तूफान आया है। सबकी हालत खराब है। पर आप इतना निश्चिंत कैसे बैठे हैं?

यह सुनते ही उस अफसर ने म्यान से तलवार निकाली और पत्नी के सिर पर रखकर पूछा- क्या तुम्हें डर लग रहा है? पत्नी बोली-मेरी बात का जवाब न देकर आप यह क्या खेल कर रहे हैं? अफसर ने फिर पूछा-बताओ, तुम्हें डर लग रहा है या नहीं? पत्नी ने कहा- मुझे भला क्यों डर लगेगा? मुझे पता है आप मेरी जान नहीं लेंगे क्योंकि आप मेरे दुश्मन नहीं हैं। आप तो मुझे अपनी जान से ज्यादा चाहते हैं। फिर मैं क्यों डरूं?

इस पर अफसर ने कहा-बिल्कुल सही। जिस तरह तुम्हें मुझ पर भरोसा है उसी तरह मुझे ईश्वर पर भरोसा है। वह हम सब का अभिभावक है। वह हमारा बुरा क्यों चाहेगा? वह तो हमारे पिता के समान है। वह हर संकट में हमारी सहायता ही करेगा। इसलिए तूफान आया है तो वह चला भी जाएगा। जीवन में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। इससे हमें बड़ी ताकत मिलती है। हम इसी ताकत के सहारे जीते हैं। इसलिए हमें किसी न किसी के प्रति विश्वास तो रखना ही होगा। वही लोग घबराते हैं या अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते हैं जिनमें विश्वास की कमी होती है। संयोग से उसी समय तूफान थम गया।

एक अनोखा फैसला

चीन का दार्शनिक लाओत्से अपने विचार और बुद्धि के कारण काफी प्रसिद्ध था। चीन के राजा ने लाओत्से से प्रधान न्यायाधीश बनने का अनुरोध किया और कहा- संपूर्ण विश्व में आप जैसा बुद्धिमान और न्यायप्रिय कोई नहीं है। आप न्यायाधीश बन जाएंगे तो मेरा राज्य आदर्श राज्य बन जाएगा। लाओत्से ने इनकार करते हुए कहा कि वह उस पद के लिए उपयुक्त नहीं है। लेकिन राजा नहीं माना।

लाओत्से ने उसे समझाया- मुझे न्यायालय में एक दिन कार्य करते देखकर आपको अपना विचार बदलना पड़ेगा। मेरा मानना है कि संपूर्ण व्यवस्था में ही दोष है। आपके प्रति आदर भाव रखने के कारण ही मैंने आपसे सत्य नहीं कहा है। अब या तो मैं न्यायाधीश बना रहूंगा या आपके राज्य की कानून-व्यवस्था बनी रहेगी। देखें, क्या होता है।

पहले ही दिन न्यायालय में एक चोर को लाया गया जिसने राज्य के सबसे धनी व्यक्ति का लगभग आधा धन चुरा लिया था। लाओत्से ने मामले को अच्छे से सुना और अपना निर्णय सुनाया- चोर और धनी व्यक्ति, दोनों को छह-छह महीने की जेल की सजा दी जाए। धनी व्यक्ति ने कहा- आप यह क्या कर रहे हैं? चोरी मेरे घर में हुई है! मेरा धन चुरा लिया गया है, फिर भी आप मुझे जेल भेजने का निर्णय कर रहे हैं। यह कैसा न्याय है?


लाओत्से ने कहा- मुझे तो लगता है कि मैंने चोर के प्रति न्याय नहीं किया है। तुम्हें वास्तव में अधिक लंबा कारावास देने की आवश्यकता है। क्योंकि तुमने आवश्यकता से अधिक धन जमा करके बहुत से लोगों को संपत्ति से वंचित कर दिया है! देश में हजारों लोग भूखे मर रहे हैं लेकिन धन संग्रह करने की तुम्हारी लालसा कम नहीं होती। तुम्हारे लालच के कारण ही ऐसे चोर पैदा हो रहे हैं। अपने घर में होने वाली चोरी के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। तुम अधिक बड़े अपराधी हो। राजा ने लाओत्से को उसी दिन हटा दिया।

शायर की उदारता

प्रख्यात शायर जिगर मुरादाबादी बहुत ही उदार और दयालु थे। किसी की मदद करने का कोई मौका वह छोड़ते नहीं थे। अपने इस स्वभाव के चलते वह काफी लोकप्रिय थे और लोग उन्हें सम्मान देते थे। एक बार वह अपने एक मित्र के साथ कहीं जा रहे थे। जिगर साहब के दोस्त ने देखा कि एक शख्स उन्हें देख कर आंखें चुरा रहा है और मुंह छुपाने की कोशिश कर रहा है। दोस्त ने कहा-हजरत! माजरा क्या है? वह आदमी आपको देखकर इस तरह झेंप क्यों रहा था? और आंखें क्यों चुरा रहा था? अगर वह आपको जानता था तो सामने क्यों नहीं आया। दुआ सलाम करता। और जनाब आप भी कुछ नहीं बोले। आप उसे जानते हैं क्या? 

जिगर मुरादाबादी बोले- अच्छी तरह जनता हूं उसे। हकीकत यह है कि एक दिन इस आदमी ने मेरी जेब से पैसे चुराए थे इसलिए मुझे पहचान कर झेंप रहा था। इस पर मित्र ने कहा- जब तुम्हें पता चल गया कि यह वही है तो तुमने मुझे बताया क्यों नहीं? मैं उसकी खबर लेता। तुम तो बड़े आराम से देख रहे थे। 

जिगर मुरादाबादी ने हंसकर कहा- अरे भाई, उसकी खबर लेने के लिए मैं गया था उसके घर। पर वहां जो देखा उसे बयान करना मुश्किल है। क्या बताऊं, उसके घर की हालत बेहद खराब थी। उसके बीवी-बच्चों के पास खाने को कुछ नहीं था। अब तुम ही बताओ मैं क्या करता। मैं चुपचाप वहां से लौट आया। जिगर मुरादाबादी का दोस्त यह सुनकर अवाक रह गया। उसके भीतर मुरादाबादी के लिए इज्जत थोड़ी और बढ़ गई। 

लीलावती का संकल्प

प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिषी भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती कम उम्र में ही विधवा हो गई। वह हमेशा दुखी रहने लगी। भास्कराचार्य से अपनी पुत्री का दुख देखा न गया और वह उसे उसकी ससुराल से अपने घर ले आए। लीलावती यहां भी सारा दिन बैठकर अपने भाग्य पर आंसू बहाती, कुछ खाती न पीती, केवल शून्य में निहारती रहती।

उसे रोते देखकर एक दिन भास्कराचार्य बोले, 'बेटी, मैं तुम्हारा दुख समझता हूं। लेकिन जो हो चुका वह वापस तो नहीं आ सकता। यदि तुम इसी प्रकार रो-रोकर घुलती रही तो तुम्हारे अस्तित्व और व्यक्तित्व का नामोनिशान ही मिट जाएगा। तुम्हें अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए और अपने व्यक्तित्व को सार्थक रूप देने का प्रयास करना चाहिए।' यह सुनकर लीलावती बोली, 'पिताजी, मैं क्या करूं? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। आप ही बताइए कुछ।' भास्कराचार्य बोले, 'बेटी, तुम प्रखर बुद्धि हो। अपना मन गणित सीखने में लगाओ। यह तुम्हें सदमे तथा दुख को भुलाने में मदद करेगा और तुम्हें जीने की एक नई दिशा देगा।'

अपने पिता की यह बात लीलावती को ठीक लगी और उसने अपना समय गणित सीखने में लगा दिया। धीरे-धीरे वह अपना सारा दुख भूलने लगी। अब वह दिन-रात गणित के प्रश्नों व पहेलियों में खोई रहती। काफी मेहनत करके उसने अंकगणित के अनेक नए नियम निर्धारित किए। उसके बनाए नियम आज तक माने जाते हैं। उसने अंकगणित पर अनेक गं्रथों की रचना भी की। लीलावती ने पिता भास्कराचार्य को गणित संबंधी शोध कार्य में इतना सहयोग दिया कि उसके पिता ने अपने एक गं्रथ का नाम भी लीलावती के नाम पर रखा। इस ग्रंथ ने लीलावती तथा भास्कराचार्य को अमर कर दिया। इस तरह लीलावती ने साबित किया कि यदि व्यक्ति दृढ़ संकल्प कर ले तो वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी एक अलग राह बना सकता है।

नियम का सम्मान


एक समय महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) एक साथ जेल में बंद थे। वहां बंद सभी कैदी और आंदोलनकारी गांधीजी का आदर करते थे। लेकिन दूसरी तरफ गांधीजी जेलर के सामने आने पर अन्य कैदियों के साथ खुद भी सम्मान में खड़े हो जाते थे। 

यह बात खान साहब को पसंद नहीं थी। एक दिन उन्होंने गांधीजी से कहा-हम राजनैतिक कैदी हैं। हमें औरों के साथ खड़े होने की आवश्यकता नहीं है। गांधीजी ने बात टाल दी। कुछ दिनों के बाद खान साहब ने फिर कहा- मैं सब समझता हूं। आप जेल में मिलने वाली अतिरिक्त सुविधाओं के कारण जेलर का सम्मान करते हैं। वह आपको हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त गुजराती के अखबार भी दे जाता है। फिर आपके भोजन का भी वह खास ख्याल रखता है। यही बात है न? 

इस पर गांधीजी ने बड़े प्यार से उन्हें समझाया-देखो भाई, हम जिस व्यवस्था में रह रहे हैं, उसके नियमों का सम्मान करना चाहिए, नहीं तो यह व्यवस्था भी नहीं रह जाएगी। फिर हमारा संघर्ष भी एक नई व्यवस्था के लिए ही है। अगर हमारे भीतर नियम-कायदों के प्रति आदर का भाव नहीं रहेगा तो हम अराजकता को रोक नहीं पाएंगे। गांधीजी ने उस दिन से एक अखबार के अलावा सभी अखबार बंद कर दिए। और समान रूप से अन्य कैदियों की तरह ही भोजन करने लगे। लेकिन उन्होंने अधिकारियों का सम्मान नहीं छोड़ा। खान साहब को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने गांधीजी से क्षमा मांगी और खुद भी जेल के अनुशासन के मुताबिक चलने लगे।






















































ठहरा हुआ पानी

एक दिन एक संत अपने प्रवचन में कह रहे थे- अतीत में तुमसे जो पाप हो गए हैं उनका प्रायश्चित करो और भविष्य में पाप न करने का संकल्प लो। प्रवचन समाप्त होने के बाद जब सभी लोग चले गए, एक व्यक्ति थोड़ा सकुचाते हुए संत के पास पहुंचा। उसने संत से पूछा- महाराज, मन में एक जिज्ञासा है। प्रायश्चित करने से पापों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? संत ने उसे दूसरे दिन आने को कहा। दूसरे दिन वह उसे एक नदी के किनारे ले गए। नदी तट पर एक गड्ढे में भरा पानी सड़ रहा था, जिसके कारण उससे बदबू आ रही ती और उसमें कीड़े भी चल रहे थे। संत उस व्यक्ति को सड़ा पानी दिखाकर बोले-भइया, यह पानी देख रहे हो? बताओ यह क्यों सड़ा? 

व्यक्ति ने पानी को ध्यान से देखा और कहा-स्वामी जी, प्रवाह रुकने के कारण पानी एक जगह ठहर गया है और इस कारण सड़ रहा है। इस पर संत ने कहा- ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप भी इकट्ठे हो जाते हैं और वे कष्ट पहुंचाते रहते हैं। जिस तरह वर्षा का पानी इस सड़े पानी को बहाकर हटा देता है और नदी को पवित्र बना देता है उसी प्रकार प्रायश्चित रूप अमृत वर्षा इन पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है। इससे मन शुभ और सद्कार्यों के लिए तैयार हो जाता है। जब एक बार मन में परिवर्तन होता है तो व्यक्ति आगे कभी गलतियां नहीं दोहराता। इसलिए प्रायश्चित से व्यक्ति का अतीत और भविष्य दोनों ही पवित्र होता है। 

संकल्प की उड़ान

रूस का एक प्रसिद्ध हवाबाज था ओश्चेव। वह विमान से तरह-तरह की कलाबाजी दिखाया करता था। उसके करतब देखकर सब दांतों तले अंगुली दबा लेते थे। लेकिन दुर्भाग्यवश एक दिन उसके प्लेन का इंजन खराब हो गया जिससे प्लेन एक पहाड़ी से टकरा गया। उस दुर्घटना में वह बुरी तरह घायल हो गया। डॉक्टरों को उसकी जान बचाने के लिए उसके दोनों पैर काटने पड़े। यह देखकर उसके मित्र व संबंधी हताश होकर रो पड़े। एक मित्र ने उससे कहा, 'अब हम तुम्हें प्लेन उड़ाते हुए कभी नहीं देख पाएंगे।' लेकिन ऐसे भारी संकट में भी ओश्चेव ने धीरज नहीं खोया था। वह मुस्कराकर बोला, 'जरूर देख पाओगे क्योंकि मैं उड़ान भरने के लिए ही जिंदा हूं, वरना कब का मर गया होता।' ओश्चेव की बात सुनकर सभी ने सोचा कि वह स्वयं को झूठी तसल्ली देने के लिए ऐसा कह रहा है। काफी समय गुजर गया। उसके मित्र व संबंधी अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। इसी बीच ओश्चेव ने नकली पैर लगवाए और उनसे दिन-रात चलने का अभ्यास करने लगा। जब लोगांे को इस बारे में पता चला तो वे उसके पास आए और बोले, 'ओश्चेव यह तुम क्या पागलपन कर रहे हो? इससे तुम्हारे जख्म हरे हो जाएंगे।' ओश्चेव उनकी बातों पर मुस्करा कर बोला, 'मैंने पहले भी कहा था कि मैं उड़ान भरने के लिए ही जिंदा हूं।' इस पर उसके एक मित्र ने कहा, 'अब तुम किस बूते पर हवाबाजी करोगे।' ओश्चेव बोला, 'मैं आस्था और विश्वास के बूते हवाबाजी करूंगा।' इसके कुछ दिनों बाद वह बिना छड़ी के तेजी से चलने का अभ्यास करने लगा। कुछ और समय बीतने पर उसने वाकई आसमान में पहले की तरह कलाबाजी करके सबको हैरत में डाल दिया। यहां तक कि युद्ध में उसने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। इस प्रकार ओश्चेव ने अपने दृढ़ निश्चय से असंभव को संभव करके दिखा दिया ।

दिमाग में एक सीक्रेट ड्रॉअर

छुटपन में हम सबके पास एक निजी कोना होता है। यह कोना अलमारी का एक हिस्सा भी हो सकता है या किसी मेज की दराज भी। इस जगह में हम अपनी कई प्रिय चीजें संजोकर रखते हैं, फिर चाहे वह कोई बेकार का ही सामान क्यों न हो। कोई कैंडी, खुदरा पैसे, टूटे हुए खिलौने, कोई चमकीला पत्थर या संगमरमर- इन्हें इकट्ठा करके रखने में हमें सुकून मिलता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, महसूस करते हैं कि किसी सामान से ज्यादा खुशी नहीं मिलती। खुशी तो हमें अपने ही भीतर से मिलती है। 

फिर हम अपनी सोच को सकारात्मक बनाने के लिए खूब प्रयास करने लगते हैं। संदेह और आशंका के सारे बादलों को हटा देना चाहते हैं। 'ऐसा नहीं हो सकता' की जगह 'ऐसा हो सकता है' के हिसाब से सोचना शुरू कर देते हैं। और फिर इस सारी कसरत के साथ ही एक और सीक्रेट दराज बननी शुरू हो जाती है- हमारे दिमाग के भीतर। 

क्या आपने कभी देखा है कि मारिया शारापोवा जब अपने मैच के निर्णायक मोड़ पर होती हैं, तब क्या करती हैं? वह कोने में जाकर खुद से बातें करती हैं। कभी-कभी यह बातचीत इतनी लंबी हो जाती है कि साथ खेलने वाले को खीझ भी होती है। दरअसल, वह इस समय अपनी सीक्रेट दराज को खोल रही होती हैं। चाहे या अनचाहे, इसी तरह से हम सबके दिमाग में एक सीक्रेट ड्रॉअर बनी होती है। यह एक ऐसी जगह होती है, जहां हम अपनी सारी उम्मीदें, अपने सपने और उन्हें पाने की तमाम कोशिशों को सहेज कर रखते हैं। हम इसे बार-बार नहीं खोलते, कि कहीं ये अपना वजूद न खो दें। लेकिन जब हम परिस्थितियों से निराश होते हैं, खुद को असहाय समझते हैं, तब अपनी सीक्रेट दराज में धीरे से झांकते हैं। हमारे इस छिपे हुए कोने में जो आवाज होती है, वह कभी पॉजिटिव होती है, तो कभी निगेटिव भी। जब भी हमें किसी नई परिस्थिति का सामना करना पड़ता है, तब यही कोना उसके बारे में हमारा नजरिया बनाता है। 


लोगों और स्थितियों के बारे में इस कोने में तस्वीरें भी बनने लगती हैं। असल में, इन तस्वीरों में हम अपनी जगह को भी देख रहे होते हैं, कि हम किसी खास स्थिति में क्षमतावान हैं, दुविधा में हैं या फिर असहाय हैं। फिर अपनी सीक्रेट ड्रॉअर में बनी इन तस्वीरों के हिसाब से ही हम रिएक्ट करते हैं। एक छात्र का प्रोत्साहन, एक कलाकार की प्रेरणा और एक एथलीट का दृढ़ संकल्प- ये सब उनकी इस सीक्रेट ड्रॉअर में ही छिपे होते हैं। 

आपकी सीक्रेट दराज में क्या कुछ है, कभी तलाश कर देखा है?

मौत से कौन नहीं डरता है?

महाराज शतद्रुम बड़े पराक्रमी और नीतिकुशल सम्राट थे। उनके विशाल साम्राज्य और ऐश्वर्य की चर्चा चारों ओर थी। लेकिन सभी की देह कभी न कभी काल का कौर बनती है। शतद्रुम की बारी भी आ गई। राजवैद्य के प्रयास भी उन्हें बचा न सके। परंतु मरते-मरते भी जीवन लालसा छूटी नहीं। उन्होंने मंत्रियों एवं महारानी से कहा कि उनका शरीर जलाया न जाए, बल्कि उसे सुरक्षित रखने का यत्न किया जाए। किसी ऐसे तेजस्वी मुनि की खोज की जाए जो मृत शरीर में पुन: प्राणों का संचार कर दे। 

मंत्री एवं महारानी को संयोग से ऐसे ऋषि मिल भी गए। सारी बातें सुन कर महर्षि ने कहा 'पहले हमें यह पता करना पड़ेगा कि मृत्यु के बाद महाराज की जीवात्मा कहां, किस योनि में है? इसका हल तो मैं अपने योगबल से कर लूंगा। किंतु महाराज इस समय जिस योनि में हैं, उन्हें उसके शरीर से मुक्त करने का दायित्व आप सब पर है। मैं किसी प्राणी की हत्या नहीं कर सकता। 

हां, मैं उस जीवात्मा को महाराज के शरीर में प्रवेश करा दूंगा। महर्षि की बात सभी को ठीक लगी। महर्षि ने पता लगाया कि शतद्रुम राजोद्यान में एक कीड़े की योनि में हैं। सेनापति उस कीड़े को मारने पहुंचे तो वह भय से इधर-उधर छिप रहा था। यह देख महर्षि हंसे और बोले 'यही अभिनिवेश है- मरण भय है, जो एक कीड़े में उतना ही है, जितना कि शतद्रुम में था। महाराज जितना पूर्व शरीर में सुखी थे, उतने ही अभी भी हैं। जब वे स्वयं इस कीड़े के शरीर को नहीं छोड़ना चाहते तो उन्हें व्यर्थ परेशान न करो।' सभी ने महर्षि की बात मान ली।

शास्त्री जी और चावल

यह घटना उस समय की है जब लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे। उन दिनों केरल में सूखा पड़ा हुआ था। चावल की खेती पूरी तरह तहस-नहस हो गई थी। लोग चावल के दाने-दाने को तरसने लगे थे। केरल के निवासियों का मुख्य भोजन चावल ही है इसलिए राज्य सरकार चिंतित थी कि केरल निवासी गुजर-बसर कैसे करेंगे? 

शास्त्री जी भी यह जानकर अत्यंत परेशान थे। उन्होंने केरल सरकार को आश्वासन दिया कि प्रदेश के लिए चावल का उचित प्रबंध किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मेरा संकल्प है कि हर केरलवासी को चावल मिलेगा। बिना चावल के एक भी भाई-बहन भूखा नहीं रहेगा। केरल की जनता को चावल के लिए त्राहि-त्राहि करते देखकर उन्होंने अधिकारियों को चावल की कमी पूरी करने के आदेश दिए। देश के अन्य क्षेत्रों से चावल खरीदकर केरल भेजा जाने लगा। 

ऐसे में अन्य प्रदेशों में चावल की कमी तो होनी ही थी। शास्त्री जी ने रोटी खा सकने वाले लोगों से अनुरोध किया कि वे चावल का प्रयोग कम से कम करें और जो लोग स्वाद के लिए प्रतिदिन चावल का प्रयोग करते हैं, वे भी इसका प्रयोग अनिवार्य होने पर ही करें। उन्होंने अपने घर में भी सख्त निर्देश दिए थे कि जब तक केरल में चावल की कमी पूरी नहीं हो जाती तब तक उनके घर में चावल नहीं पकाए जाएंगे। यह आदेश सुनकर प्रधानमंत्री जी के बच्चे दुखी हुए क्योंकि वे चावल खाने के शौकीन थे। लेकिन सबने शास्त्री जी के आदेश का पालन किया। 
प्रधानमंत्री निवास में तब तक चावल नहीं पकाए गए जब तक कि केरल की स्थिति पर पूरी तरह से काबू नहीं पा लिया गया। केरल की सरकार व निवासियों के साथ ही पूरा भारत शास्त्री जी की यह बात जानकर उनके प्रति नतमस्तक हो गया कि उन्होंने केरल की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर प्रधानमंत्री निवास तक में चावल बनने पर रोक लगा दी

अंधा होने का तर्क

महात्मा गांधी की उक्ति है कि अगर आंख के बदले आंख का ही दस्तूर हर जगह चल पड़े तो कुछ समय बाद पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी। लेकिन उनकी इस सीधी सी बात को जैसे ही सीमा के आर-पार लागू करने की बारी आती है, हमारा धीरज जवाब दे जाता है। पाकिस्तान ने भारत का एक मारा तो बदले में पाकिस्तान के दो मारे जाने चाहिए- जैसे हम इंसानों की जिंदगी-मौत के बारे में नहीं, बाजार से आलू-टमाटर खरीदने के बारे में बात कर रहे हों।

जम्मू की कोट भलवाल जेल में पाकिस्तानी कैदी सनाउल्ला हक रांजे पर हुआ हमला कुछ-कुछ इसी तरह का है। हालांकि पाकिस्तान की तुलना में अपना हाथ ऊपर दिखाने के लिए वहां लाहौर की कोट लखपत जेल में सरबजीत पर हुए हमले के साथ इसमें दो फर्क गिनाए जा सकते हैं। सरबजीत की तरह सनाउल्ला को मौत की सजा नहीं पड़ी थी। काफी वक्त इसी जेल में बिताने के बाद सन 2008 में उसे 1994 के एक बम विस्फोट केस में आठ साल की सजा मिली थी। सश्रम कारावास की सजा पाए किसी भी कैदी की तरह उसे भी खेत में काम करना पड़ता था, जहां सामान्य स्थितियों में किसी भी जेल के अंदर सुरक्षा की कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की जा सकती। दूसरे, जैसा कि जेल प्रशासन ने बताया है, सनाउल्ला और उस पर हमला करने वाला विनोद कुमार, दोनों साथ में बीड़ी पीते हुए खेत में खुरपी चला रहे थे। वहीं बात-बात में उनका झगड़ा इतना बढ़ गया कि जब तक उन्हें छुड़ाया जाता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

शायद इससे मिलती-जुलती हुई कुछ बातें पाकिस्तान के संबंधित जेल प्रशासन ने सरबजीत पर हुए हमले के बारे में भी बताई हों। हमें यह मान लेना चाहिए कि दोनों देशों के बीच स्थितियां अभी सामान्य नहीं हैं और अगले कुछ महीनों तक सामान्य नहीं रहेंगी। इसलिए भारतीय जेलों में बंद किसी भी पाकिस्तानी कैदी को, भले ही वह कितने भी छोटे मामले को लेकर जेल में हो, फिलहाल उतनी ही सुरक्षा दी जानी चाहिए, जितनी फांसी की सजा पाए कैदियों को मानवीय शिष्टाचार के तहत दी जाती है। इंसानी धरातल से हटकर राष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो सनाउल्ला पर हमले से भारत का काफी कूटनीतिक नुकसान पहले ही हो चुका है। कथित राष्ट्रवाद के हल्ले में यह नुकसान और न बढ़े, इसका ध्यान हर स्तर पर रखा जाना चाहिए

सूर्य और दीपक

चीन के सम्राट हुआन शी को पढ़ने का शौक था। उनका पुस्तकालय और सोने का कमरा दुनिया भर की किताबों से भरा रहता था। वह अपना अधिकतर समय पढ़ने में ही लगाते थे। एक दिन सम्राट ने अपने मंत्री शान ची से कहा- मैं अब सत्तर वर्ष का हो चला हूं। मगर पढ़ने की लालसा मन से जाती नहीं है। पर लगता है कि अब इस उम्र में पुस्तकों को अधिक समय नहीं दे पाऊंगा।

मंत्री ने जवाब दिया- राजन, आप इस देश के सूर्य हैं। आपके ज्ञान के प्रकाश से ही देश का शासन सफलतापूर्वक चलता रहा है। अगर आप सूर्य नहीं बने रहना चाहते तो कृपया दीपक बन जाइए। सम्राट को लगा मंत्री ने सूर्य से दीपक बनने को कहकर उन्हें उनके स्तर से गिराया है।

उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में कहा- शान ची, मैं गंभीर होकर यह बात कह रहा हूं और तुम इसे मजाक में ले रहे हो। मैं तो तुमसे मार्गदर्शन की अपेक्षा कर रहा था। शान ची ने हाथ जोड़कर कहा- आपने मेरी बात ठीक से समझी नहीं शायद। कोई किशोर या युवा जब अध्ययन कर रहा होता है तो उसका भविष्य सूर्य के समान होता है जिसमें अपार संभावनाएं छिपी होती हैं और प्रौढ़ावस्था में यही सूर्य दीपक के समान हो जाता है। दीपक में सूर्य जितना प्रकाश तो नहीं होता फिर भी उसका उजाला अंधेरे में रोशनी दिखाकर भटकने से बचाता है। इसी प्रकार आप भी पढ़ने की अपनी रुचि का पूर्ण त्याग न करके इसमें मन लगाए रखें। सम्राट को यह बात समझ में आ गई।

विनम्रता का पाठ

पंडित विद्याभूषण बहुत बड़े विद्वान थे। दूर-दूर तक उनकी चर्चा होती थी। उनके पड़ोस में एक अशिक्षित व्यक्ति रहते थे-रामसेवक। वे अत्यंत सज्जन थे और लोगों की खूब मदद किया करते थे।

पंडित जी रामसेवक को ज्यादा महत्व नहीं देते थे और उनसे दूर ही रहते थे। एक दिन पंडित जी अपने घर के बाहर टहल रहे थे। तभी एक राहगीर उधर आया और मोहल्ले के एक दुकानदार से पूछने लगा-भाई यह बताओ कि पंडित विद्याभूषण जी का मकान कौन सा है। यह सुनकर पंडित जी की उत्सुकता बढ़ी। वह सोचने लगे कि आखिर यह कौन है जो उनके घर का पता पूछ रहा है। तभी दुकानदार ने उस राहगीर से कहा-मुझे तो किसी पंडित जी के बारे में नहीं मालूम। तब राहगीर ने कहा-क्या रामसेवक जी का घर जानते हो?

दुकानदार ने हंसकर कहा-अरे भाई उन्हें कौन नहीं जानता। वे बड़े भले आदमी हैं। फिर उसने हाथ दिखाकर कहा- वो रहा रामसेवक जी का घर। फिर दुकानदार ने राहगीर से सवाल किया-लेकिन आपको काम किससे है? पंडित जी से या रामसेवक जी से? राहगीर कहने लगा-भाई काम तो मुझे रामसेवक जी से है। पर उन्होंने ही बताया था कि उनका मकान पंडित विद्याभूषण जी के पास है। यह सुनकर पंडित जी ग्लानि से भर उठे। सोचने लगे कि उन्होंने हमेशा ही रामसेवक को अपने से हीन समझा और उसकी उपेक्षा की पर रामसेवक कितना विनम्र है। वह खुद बहुत प्रसिद्ध होते हुए भी उन्हें ज्यादा महत्व देता है। उसी रात पंडित जी रामसेवक के घर गए और उससे क्षमायाचना की। फिर दोनों गहरे मित्र बन गए।

प्रजा का हित

एक बार राजा रघु के दरबार में इस बात पर विचार चल रहा था कि राजकोष का उपयोग किसके लिए किया जाए। एक विचार यह था कि सैन्य शक्ति बढ़ाई जाए ताकि न केवल राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित हो बल्कि क्षेत्र विस्तार की योजना भी आगे बढ़े। इस पर जो खर्च पड़ेगा वह पराजित देशों से मिलने वाले कर से पूरा हो सकेगा।

दूसरा विचार यह उभरकर आया- राजकोष का उपयोग जन कल्याण के लिए होना चाहिए। प्रजा का स्तर उठाने में राजकोष खाली कर दिया जाए। सुखी, संतुष्ट, साहसी और संभावनाशील नागरिकों में से प्रत्येक एक दुर्ग होता है। उन्हें जीतना किसी शत्रु के लिए संभव नहीं। इस प्रकार युद्ध में क्षेत्र जीतने की अपेक्षा मैत्री का विस्तार कहीं अधिक लाभदायक है। उससे स्वेच्छा, सहयोग और अपनत्व की ऐसी उपलब्धियां प्राप्त होती है, जिनके कारण छोटा देश भी चक्रवर्ती स्तर का बन सकता हे। दोनों पक्षों के विमर्श चलते रहे। खूब गर्मागर्म बहस हुई। दोनों पक्ष ने जोरदार दलीलें दीं।

अंतिम निर्णय राजा को करना था। सब उत्सुक थे कि वे क्या कहते हैं? राजा रघु ने कहा- युद्ध पीढ़ियों से लड़े जाते रहे हैं। उनके कड़वे, मीठे परिणाम भी स्मृति पटल पर अंकित हैं। इस बार युद्ध के प्रयोजनों की उपेक्षा कर लोक मंगल की परिणति को परखा जाए और समस्त संपत्ति जन कल्याण की योजनाओं में खर्च कर दी जाए। कुछ लोगों को यह अटपटा लगा लेकिन राजा का आदेश था। वैसा ही किया गया।

धीरे-धीरे प्रजाजन हर दृष्टि से समुन्नत हो गए। पड़ोसी राज्यों को समाचार मिले तो उनके हौसले टूट गए। आक्रमण की चर्चाएं समाप्त हो गई। सुख शांति के समाचार पा कर अन्य देशों के समर्थ लोग वहां आ कर बसने लगे। बंजर भूमि सोना उगलने लगी और उत्साही प्रजाजन ने अपने राज्य को ऐसा बना दिया, जिसके कारण अयोध्या अन्य राज्यों की तुलना में विशिष्ट बन गया।

बुरे फंसे नेहरू जी



स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही समय बाद की घटना है। पंडित जवाहरलाल नेहरू शाम को अपने लॉन में टहल रहे थे। वे टहलते हुए एक तरफ की दीवार तक जा पहुंचे। इस समय उन्होंने टोपी नहीं पहन रखी थी। जब नेहरू जी वापस जाने को मुड़े तो एक सुरक्षा गार्ड की उन पर नजर पड़ी। वह उन्हें अजनबी समझकर उनकी ओर लपका। उसने आदेशात्मक स्वर में उन्हें रुकने के लिए कहा और कड़ककर पूछा कि वह कौन हैं और यहां क्यों आए हैं।

असल में वह सुरक्षा गार्ड नया था और उसने हमेशा नेहरू जी को दूर से देखा था और वह भी टोपी पहने हुए। नेहरू जी समझ गए कि गार्ड को गलतफहमी हुई है। इसलिए उन्होंने शांतिपूर्वक अपना परिचय दिया। लेकिन गार्ड ने उन पर यकीन ही नहीं किया। उसकी हिदायत के अनुसार नेहरू जी को सुरक्षा अधिकारियों के पास जाना पड़ा। सुरक्षा अधिकारी उन्हें अचानक सामने देखकर हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने तत्काल खड़े होकर उन्हें सैल्यूट किया। अब तो उस सुरक्षा गार्ड के होश उड़ गए। उसे अपनी गलत समझ में आ गई।

वह नेहरू जी के चरणों में गिर गया और उनसे अपने अपराध के लिए क्षमा मांगने लगा। पर नेहरू जी ने थोड़ा भी क्रोध नहीं किया। इसके विपरीत उस गार्ड की कर्त्तव्यनिष्ठा पर प्रसन्नता व्यक्त की। इसके साथ ही उन्होंने यह निर्णय लिया कि वह प्रतिवर्ष होली के दिन एक घंटे का समय अपने गार्डों के साथ बिताएंगे ताकि वह उन सबको पहचान सकें। और गार्ड भी उन्हें अच्छी तरह जान लें। इसके बाद से यह परंपरा ही चल निकली।
संकलन: राधा नाचीज़

सर्वश्रेष्ठ राजा कौन

राजा मलिक अपनी प्रजा की सेवा में दिन-रात जुटा रहता था। उसकी प्रजा परम संतुष्ट थी। एक दिन राजा ने सोचा कि मेरी कीर्ति चारों ओर फैली हुई है। सब मेरी प्रशंसा करते हैं। मुझे इस बात का पता लगाना चाहिए कि क्या मैं सचमुच श्रेष्ठ हूं?

उसने अपने राज्य के विद्वानों से पूछा तो सभी ने कहा, 'महाराज आप तो सर्वश्रेष्ठ हैं। आपका चरित्र, व्यवहार और विचार चंद्रमा के समान धवल है।' राजा ने सोचा, हो सकता है मुझे प्रसन्न करने के लिए ये मेरी प्रशंसा कर रहे हों। इसलिए उसने सच जानने के लिए गांव-गांव जाकर पता किया। सभी स्थानों पर यही उत्तर मिला।

राजा मलिक गर्व से फूला जब अपनी राजधानी लौट रहा था, तब उसका सामना राजा ब्रह्मदत्त से हो गया। दोनों के रथ आमने-सामने थे। ब्रह्मदत्त के सारथी ने मलिक से कहा, 'मेरे रथ पर समस्त गुणों के भंडार बैठे हैं। अपना रथ हटा लीजिए।' राजा मलिक ने कहा, 'सभी गुणों का भंडार तो मैं हूं। आप अपने रथ को बगल में कर लो।'

छोटी सी बात

जर्मनी के एक स्कूल की छुट्टी हुई तो दो दोस्त रोज की तरह खेलते-कूदते घर की ओर चले। यह उनका रोज का नियम था। दोनों स्कूल साथ-साथ आते भी थे और साथ-साथ घर भी लौटते थे। उस दिन रास्ते में एक अखाड़ा देख वे मस्ती के मूड में आ गए। वे बस्ता एक ओर रखकर कुश्ती लड़ने लगे। दोनों में जो कमजोर बालक था वह हार गया और बलवान जीत गया।

जीतने वाला बालक शेखी बघारने लगा। कमजोर बालक ने कहा-देखो अगर मैं भी तुम्हारी तरह अमीर घर में पैदा हुआ होता तो मुझे भी खाने में पौष्टिक खुराक मिलती। तब शायद तुम्हारी जगह मैं जीतता। यह छोटी सी बात उस विजयी बालक के दिल को छू गई। वह अपने मित्र की बात से बेहद दुखी हुआ लेकिन उसने मन ही मन कुछ निश्चय कर लिया।

वह उस दिन से खूब मन लगाकर पढ़ने लगा। उसने खेलना-कूदना कम कर दिया और शरारतें भी छोड़ दीं। पढ़ाई में वह अव्वल आने लगा और फिर एक दिन वह डॉक्टर बन गया। लेकिन अपने बचपन के उस मित्र की छोटी सी बात वह कभी नहीं भूला। उसने और डॉक्टरों से अलग रास्ता चुना। उसने निर्बलों और गरीबों की सहायता करना अपना लक्ष्य बना लिया।

महारानी का संदेश

बेबीलोन की शासिका माटीक्रिस ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में परिवार के लोगों को आदेश दिया कि 'मेरी कब्र के ऊपर पत्थर पर यह लिखवा देना कि इसके नीचे जमीन में सोना तथा हीरे दबे हुए हैं।' इसके बाद उन्होंने कागज पर कुछ लिखा तथा उसे बंद लिफाफे में रखकर कहा, 'इसे संदूक में रखकर कब्र के नीचे दबा देना।' कुछ ही समय बाद महारानी की मृत्यु हो गई। उनकी अंतिम इच्छानुसार ही सब कुछ किया गया।

कुछ समय बाद ईरान के बादशाह डेरियस ने बेबीलोन पर हमला कर उसे जीत लिया। वे महारानी माटीक्रिस की कब्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने गए। उनकी नजर पट्टिका पर लिखे शब्दों पर पड़ी। उन्होंने उसे पढ़ा तो यह जानकर उत्साहित हो गए कि उन्हें यहां काफी दौलत मिलेगी। धन का ख्याल आते ही उनकी विवेक बुद्धि चली गई और उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि इस तरह धन गाड़कर कोई क्यों रखेगा और फिर उसके बारे में लिखेगा ही क्यों? और लिखे जाने के बाद क्या अब तक किसी ने धन निकालने की कोशिश नहीं की होगी?

यह सब विचार किए बगैर उन्होंने सैनिकों को कब्र खोदने का आदेश दिया। कब्र खोदने पर उसके नीचे से एक भारी संदूक निकला। डेरियस ने जल्दी से संदूक को खोला तो उसमें एक कागज पर लिखा था, 'अरे नादान इंसान, बिना मेहनत का धन हासिल करने के लालच में तुझे मृतक की कब्र खोदते हुए शर्म नहीं आई। बिना परिश्रम से अर्जित की गई दौलत आदमी को सिर्फ नाकारा नहीं बनाती, बल्कि उसकी जिंदगी के तमाम अच्छे कामों पर पानी फेर कर उसके लिए दोजख के रास्ते खोल देती है।'

लिंकन का संकल्प

यह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की युवावस्था के दिनों की घटना है। वह बहुत निर्धन थे, लेकिन उनके भीतर बहुत कुछ कर गुजरने की अद्भुत ललक थी। एक बार उन्हें पता चला कि उनके गांव के किनारे बहने वाली नदी के दूसरी ओर एक रिटायर्ड जज रहते हैं जिनके पास कानून की पुस्तकों का अच्छा संग्रह है। लिंकन वे किताबें पढ़ने के लिए बेचैन हो गए। 

उन्होंने उनके घर जाने का निश्चय कर लिया। उन दिनों कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। पर लिंकन ने इसकी परवाह नहीं की। वे उस बर्फीली नदी में नाव लेकर अकेले चल पड़े। आधी नदी पार करने के बाद ही नाव बर्फ के एक बड़े चट्टान से टकराकर टूट गई। फिर भी लिंकन निराश नहीं हुए। उन्होंने बड़ी मुश्किल से नदी तैरकर पार की और जा पहुंचे उस रिटायर्ड जज के घर। 

जज महोदय लिंकन को देखकर हैरत में पड़ गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि लिंकन पर भरोसा करें या नहीं पर उन्होंने लिंकन की आंखों में दृढ़ निश्चय को पढ़ लिया था। सो उन्होंने एक शर्त पर उन्हें अपने यहां कुछ दिनों के लिए रख लिया और अपनी किताबें पढ़ने की इजाजत दे दी। शर्त यह थी कि लिंकन उनके घर का छोटा-मोटा काम कर देंगे। 

सबसे बड़ी दौलत

एक विधवा अध्यापिका के दो बेटे थे। वह उन्हें गुरुकुल में अच्छी शिक्षा दिला रही थी। वह खुद भी अनेक बच्चों को संस्कृत पढ़ाती थी। इससे उसे जो कुछ प्राप्त होता था, उसी से वह अपना जीवनयापन करती थी। उसने अत्यंत गरीबी के दिनों में भी कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए। उसके स्वाभिमान को देख अनेक लोग अध्यापिका का बहुत आदर करते थे।

एक दिन एक बहुत बड़े सेठ को अध्यापिका की विद्वता व उसकी निर्धनता के बारे में मालूम हुआ। उस सेठ के कोई संतान नहीं थी। उसने सोचा हुआ था कि वह कुछ गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें धन प्रदान करेगा। सेठ अध्यापिका के घर पहुंचा और बोला, 'देवी, आप निर्भीक व स्वाभिमानी हैं। मैं चाहता हूं कि आपके बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण करें। उसके लिए आप यह कुछ रुपये स्वीकार करें।' इसके बाद उसने रुपयों की थैली अध्यापिका की ओर बढ़ाई। अध्यापिका हाथ जोड़कर सेठ से बोली, 'शायद आपको कुछ भ्रम हो गया है। मैं इतनी गरीब भी नहीं हूं कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा न दे पाऊं। मेरे पास जितनी दौलत है, उतनी शायद ही किसी के पास हो।' सेठ अचरज से बोला, 'कहां है दौलत, जरा हमें भी तो बताइए।'

अध्यापिका ने अपने दोनों पुत्रों को आवाज लगाई तो दोनों पुत्र तुरंत वहां आए और अपनी मां के पैर छूने के बाद उन्होंने सेठ के पैर छुए। फिर उन्होंने मां से पूछा, 'कहिए कैसे याद किया?' दोनों पुत्रों की ओर देखकर अध्यापिका बोली, 'यही दोनों मेरी सबसे बड़ी दौलत हैं।' दोनों लड़कों को देखकर सेठ अभिभूत हो गया और बोला, 'बिल्कुल सही। वास्तव में जिसकी संतान संस्कारी और गुणी है, वह कभी गरीब हो ही नहीं सकता।' अध्यापिका ने सेठ से कहा, 'जो कुछ आप मुझे देने आए हैं, उसे अनाथ बच्चों को शिक्षित करने के लिए दे दें।' सेठ ने वैसा ही किया।

धन का भार

पाटलिपुत्र में नाभिकुमार की गिनती सबसे संपन्न लोगों में होती थी। लेकिन अपार धन-संपत्ति होते हुए भी उन्होंने कभी दान नहीं दिया था। कई लोगों ने उन्हें इस बारे में कहा था पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। एक रात उनके घर चोर ने सेंध लगाई। उसने सावधानी से घर का कीमती सामान एकत्र किया और उसकी एक बड़ी पोटली बनाई। पोटली सिर पर रखते ही वह गिर गई और आवाज होते ही नाभिकुमार की आंखें खुल गईं।

ह चोर के पास आए और पोटली उठाने में उसकी मदद करने लगे। चोर को डर से कांपते हुए देखकर नाभिकुमार ने उससे कहा-डरो मत, तुम यह सब ले जा सकते हो। मगर तुम भी मेरे ही जैसे लगते हो। मैंने भी अपने जमा धन से किसी और के लिए कुछ नहीं निकाला। इसलिए मेरा धन भी मुझ पर भार की तरह है। अगर तुम भी मेरी तरह नहीं करते और पोटली में से थोड़ा सामान निकाल लिए होते तो तुम्हारे लिए इसे उठाना आसान हो जाता। खैर, तुम अब यह सामान ले जा सकते हो। चोर यह सुनकर दंग रह गया।

उसने प्रायश्चित करने के उद्देश्य से कहा- आप यह सब वापस ले लीजिए और मुझे क्षमा कीजिए। नाभिकुमार ने कहा- तुम्हें एक ही शर्त पर क्षमा किया जा सकता है। तुम इसमें से कुछ धन ले लो और कोई काम-धंधा शुरू कर दो। इस प्रकार मेरा धन परोपकार के काम में लग जाएगा और तुम्हारा जीवन भी सुधर जाएगा। चोर ने वैसा ही किया। नाभिकुमार उस दिन से हर किसी की सहायता करने लगे।

प्रजा का खजाना


फारस के शासक साइरस अपनी प्रजा की भलाई में जुटे रहते थे। लेकिन खुद उनका जीवन सादगी से भरा था। वह रियासत की सारी आमदनी व्यापार, उद्योग और खेतीबाड़ी में लगा देते थे। इस कारण शाही खजाना हल्का रहता था। लेकिन प्रजा खुशहाल थी। एक दिन साइरस के दोस्त और पड़ोसी शासक क्रोशियस उनके यहां आए। उनका मिजाज साइरस से बिल्कुल अलग था। उन्हें प्रजा से ज्यादा अपनी खुशहाली की चिंता रहती थी। उनका खजाना हमेशा भरा रहता था। बातों-बातों में जब क्रोशियस को साइरस के खजाने का हाल मालूम हुआ तो उन्होंने साइरस से कहा, 'अगर आप इसी तरह प्रजा के लिए खजाना लुटाते रहोगे तो एक दिन वह एकदम खाली हो जाएगा। आप कंगाल हो जाओगे। अगर आप भी मेरी तरह खजाना भरने लगें तो आपकी गिनती मेरी तरह सबसे धनी शासकों में होने लगेगी।' साइरस मुस्कराए फिर बोले 'आप दो दिन ठहरिए मैं इस मामले में लोगों का इम्तिहान लेना चाहता हूं।' उन्होंने घोषणा करवा दी कि एक बहुत बड़े काम के लिए साइरस को दौलत की निहायत जरूरत है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि प्रजा मदद करेगी। दो दिन पूरा होने से पहले ही शाही महल के बाहर मोहरों, सिक्कों व जेवरों का बड़ा ढेर लग गया। यह देख क्रोशियस हैरत में पड़ गए। साइरस ने कहा, 'मंैने रियासत का खजाना लोगों की खुशहाली पर खर्च करके एक तरह से उन्हीं को सौंप दिया है। लोग उसमें इजाफा करते रहते हंै। मुझे जब जरूरत होगी वे मुझे लौटा दंेगे जबकि तुम्हारा खजाना बांझ है, वह कोई बढ़ोतरी नहीं कर रहा है।' 

संत की सीख

एक धनी सेठ ने एक संत के पास आकर उनसे प्रार्थना की, 'महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना करता हूं पर मेरा मन एकाग्र ही नहीं हो पाता है। आप मुझे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र बताएं।' सेठ की बात सुनकर संत बोले, 'मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और तुम्हें एकाग्रता का मंत्र प्रदान करूंगा।' यह सुनकर सेठ बहुत खुश हुआ। उसने इसे अपना सौभाग्य समझा कि इतने बड़े संत उसके घर पधारेंगे।

उसने अपनी हवेली की सफाई करवाई और संत के लिए स्वादिष्ट पकवान तैयार करवाए। नियत समय पर संत उसकी हवेली पर पधारे। सेठ ने उनका खूब स्वागत-सत्कार किया। सेठ की पत्नी ने मेवों व शुद्ध घी से स्वादिष्ट हलवा तैयार किया था। चांदी के बर्तन में हलवा सजाकर संत को दिया गया तो संत ने फौरन अपना कमंडल आगे कर दिया और बोले, 'यह हलवा इस कमंडल में डाल दो।' सेठ ने देखा कि कमंडल में पहले ही कूड़ा-करकट भरा हुआ है। वह दुविधा में पड़ गया। उसने संकोच के साथ कहा, 'महाराज, यह हलवा मैं इसमें कैसे डाल सकता हूं।

कमंडल में तो यह सब भरा हुआ है। इसमें हलवा डालने पर भला वह खाने योग्य कहां रह जाएगा, वह भी इस कूड़े-करकट के साथ मिलकर दूषित हो जाएगा।' यह सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, 'वत्स, तुम ठीक कहते हो। जिस तरह कमंडल में कूड़ा करकट भरा है उसी तरह तुम्हारे दिमाग में भी बहुत सी ऐसी चीजें भरी हैं जो आत्मज्ञान के मार्ग में बाधक हैं। सबसे पहले पात्रता विकसित करो तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे। यदि मन-मस्तिष्क में विकार तथा कुसंस्कार भरे रहेंगे तो एकाग्रता कहां से आएगी। एकाग्रता भी तभी आती है जब व्यक्ति शुद्धता से कार्य करने का संकल्प करता है।' संत की बातें सुनकर सेठ ने उसी समय संकल्प लिया कि वह बेमतलब की बातों को मन-मस्तिष्क से निकाल बाहर करेगा।

मित्र के बर्तन

बांग्ला के प्रसिद्ध कवि-नाटककार गिरीशचन्द्र घोष के एक रईस मित्र थे। वे अपनी रईसी अपने व्यवहार में भी दिखाते रहते थे। जैसे वह कहीं भी जाते तो उनका नौकर उनके लिए चांदी के बर्तन साथ लेकर चलता था। वे अपना खाना उसी में खाते थे। घोष महाशय को यह बात अखरती थी। पर वह मित्र का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। फिर भी उन्होंने तय किया कि वह उसकी आदतों को सुधार कर रहेंगे। एक दिन घोष महाशय ने दावत दी और अपने उस रईस दोस्त को भी बुलाया।

हमेशा की तरह उनके मित्र अपने नौकर के साथ पहुंचे। नौकर बर्तन लेकर आया था। लेकिन घोष महाशय अपने मित्र के आते ही उन्हें और लोगों के बीच ले गए। जब तक मित्र कुछ समझ पाते तब तक उनके सामने पत्तल में खाना परोस दिया गया। बाकी लोगों के सामने भी पत्तल में खाना रखा था। मित्र संकोच में पड़ गए। उन्होंने नौकर को आवाज देना चाहा लेकिन तब तक सब लोग खाने लगे और उनसे भी खाने का अनुरोध करने लगे।

बेचारे को उनके साथ पत्तल में खाना पड़ा। खाने के बाद ज्यों ही वे उठे, घोष महाशय उनके बर्तनों में व्यंजन लेकर उनके सामने हाजिर हुए। उन्होंने हंसते हुए मित्र से कहा-थोड़ी गलतफहमी हो गई थी। जब तुम्हारे नौकर को घर की महिलाओं ने बर्तन लेकर आते देखा तो उन्हें लगा कि शायद तुम अपने बच्चों के लिए खाना ले जाना चाहते हो। उन्होंने इसमें खाना दे दिया है। मित्र लज्जित होकर चले गए। उन्हें गलती का अहसास हो गया। उन्होंने प्रदर्शन करना छोड़ दिया।

व्यापारी के बेटे


एक व्यापारी के दो पुत्र थे। मरने से पहले उसने अपनी संपत्ति दोनों बेटों में बराबर-बराबर बांट दी। एक पुत्र ने अपने व्यापार को काफी बढ़ाया। वह अत्यंत संपन्न होकर समाज के प्रतिष्ठित लोगों में गिना जाने लगा। जबकि दूसरे को व्यापार में घाटा हो गया और उसके परिवार को दो जून की रोटी जुटाने में भी अत्यंत तकलीफें उठानी पड़ीं। अपने भाई की तरक्की और अपनी दुर्दशा देखकर दूसरा भाई एक संत के आश्रम में पहुंचा और बोला, 'महाराज, मुझे लगता है कि ईश्वर केवल कल्पना है और यदि उसका अस्तित्व कहीं है भी तो वह पक्षपाती है। क्या वह भी पक्षपात करता है? मैं और मेरे भाई दोनों एक ही पिता की संतान हैं। पिता ने दोनों को बराबर हिस्सा दिया। लेकिन वह लगातार तरक्की कर रहा है और मैं रसातल की ओर जा रहा हूं। भला ऐसा क्यों?'

उसकी बात सुनकर संत उसे अपने साथ एक बगीचे में ले गए और बोले, 'देखो, वहां एक कोने में गन्ना बोया हुआ है, दूसरे कोने में चिरायता है, एक ओर चमेली के फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं तो दूसरी ओर गुलाब के पौधों पर फूलों के साथ कांटे भी नजर आ रहे हैं । इनकी इस भिन्नता के लिए इन्हें पैदा करने वाली जमीन दोषी या पक्षपाती नहीं है। जैसा बीज बोया गया है वैसा ही फल मिला है। सुख-दुख और उन्नति-अवनति के लिए ईश्वर जिम्मेदार नहीं बल्कि स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है। उसके कर्म और संस्कार जिम्मेदार हैं। तुम्हारे भाई ने मेहनत और योग्यता से अपने काम को संभाला तो उसकी उन्नति होती गई, इसके विपरीत तुमने आलस्य और भोग-विलास में अपना समय व्यतीत किया तो तुम्हारा धन धीरे-धीरे खत्म होता गया। तुमने मेहनत की ही कब थी जो ईश्वर को दोष दे रहे हो। जैसा कर्म तुमने किया है वैसा ही फल पाया है।'

ह सुनकर दूसरे पुत्र की आंखें खुल गईं। वह अपनी गलती सुधारने का निश्चय कर वहां से चला आया।

दौलत की चाह


संत जुनैद की एक झलक पाने और उनसे ज्ञान की बातें सुनने के लिए लोग बेकरार रहते थे। पर जुनैद दुनियावी चीजों से तटस्थ और निर्लिप्त रहते थे। वह खाने-पीने और अपने कपड़े से भी बेपरवाह रहते थे। वह हर समय घूमते रहते थे। जहां भी रात होती वह वहीं टिक जाते। एक बार वह एक बड़े शहर के बाहर रुके तो शहर के जाने-माने एक सेठ उनके दर्शन के लिए आ पहुंचे। वह अपने साथ ढेर सारी स्वर्ण मुद्राएं लेकर आए थे।

उन्होंने उसकी थैली जुनैद के चरणों में रख दी और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। जुनैद ने थैली पर नजर डाली, फिर मुस्कराते हुए पूछा-क्या इसके अलावा भी आपके पास और दौलत है? सेठ जी ने प्रसन्न होकर सोचा कि जुनैद को और भी धन चाहिए। सेठ ने कहा-मेरे पास तो इससे कई गुना धन-संपत्ति और है। सेठ ने पूछा-क्या आप और दौलत पाने की ख्वाहिश रखते हैं? सेठ ने कहा- हां, हां क्यों नहीं, अब इतने से क्या होता है। थोड़ी और दौलत मिल जाए तो जिंदगी बेहतर हो जाएगी।

जुनैद ने कहा- तब तो ये दौलत भी आप ही रख लीजिए। इसकी असल जरूरत तो आपको ही है। आपको और धन-संपत्ति चाहिए। इतना आप मुझे ही दे देंगे तो आपका खजाना थोड़ा खाली हो जाएगा। जिसके पास सब कुछ हो लेकिन और पाने की चाह हो, उसके दान का भी कोई अर्थ नहीं है। यह सुनकर सेठ जी लज्जित हो गए। उन्होंने जुनैद से वादा किया कि वह अब और दौलत के पीछे नहीं भागेंगे।

धर्म का अर्थ


किसी संत के पास एक युवक आया और उसने उनसे धर्म ज्ञान देने की प्रार्थना की। संत ने कहा कि वह उनके साथ कुछ दिन रहे, फिर वे उसे धर्म का सार बताएंगे। युवक उनके आश्रम में रहने लगा। वह संत की हर बात मानता और उनकी सेवा करता। इस तरह कई दिन बीत गए। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि संत उसे धर्म के बारे में कब बताएंगे। वह उनसे धर्म की चर्चा करने के लिए उत्सुक था।

वह चाहता था कि उनसे शिक्षा प्राप्त कर घर लौट जाए पर संत कुछ खास कह ही नहीं रहे थे। युवक का धैर्य जवाब दे रहा था। एक दिन उसने पूछ ही दिया-मुझे आए इतने दिन हो गए पर अब तक आपने मुझे धर्म का सार नहीं बताया। आखिर मैं कब तक प्रतीक्षा करूं? संत ने हंसकर कहा-कैसी बात कर रहे हो। तुम जिस दिन से मेरे साथ रह रहे हो उस दिन से मैं तुम्हें धर्म का सार बता रहा हूं। पर तुम ध्यान ही नहीं दे रहे। युवक ने चौंककर कहा-वो कैसे?

संत बोले- जब तुम मेरे लिए पानी लाते हो, मैं उसे सदैव प्रेम से स्वीकार करता हूं। तुम्हारे प्रति आभार भी प्रकट करता हूं। जब-जब तुमने मुझे आदरपूर्वक प्रणाम किया, मैंने तुम्हारे साथ नम्रता का व्यवहार किया। यही तो धर्म है जो हमारे दैनंदिन व्यवहार में झलकता है। धर्म कोई पुस्तकीय ज्ञान नहीं है। तुम मेरे और कार्यों पर गौर करो। मैं लोगों से कैसे मिलता हूं और किस तरह उनकी सहायता करता हूं। इससे अलग कुछ भी धर्म नहीं है। युवक संत का आशय समझ गया।

आत्मज्ञान के लिए पात्रता


एक बार की बात है। एक धनिक सेठ एक पहुंचे हुए संत के पास पहुंचा और उनसे बोला, 'महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना का प्रयास करता हूं। परंतु मेरा मन ध्यान में एकाग्र ही नहीं हो पाता। आप मुझे मेरे मन को एकाग्र करने का कोई मंत्र बताएं।' धनिक सेठ की बात सुनकर संत बोले, 'मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और वहां पर तुम्हें एकाग्रता का मंत्र प्रदान करूंगा।' यह सुनकर सेठ बहुत खुश हुआ कि एक पहुंचे हुए संत उसके घर पधारेंगे। उसने अपनी हवेली की सफाई करवाई और संत के लिए अच्छे-अच्छे पकवान तैयार करवाए। नियत समय पर संत उसकी हवेली पर पधारे। सेठ ने उनका बहुत स्वागत सत्कार किया। सेठ की पत्नी ने मेवों व शुद्ध घी से स्वादिष्ट हलवा तैयार किया था। चांदी के पात्र में हलवा सजाकर संत को दिया गया तो संत ने फौरन अपना कमंडल आगे कर दिया और बोले, 'यह हलवा इस कमंडल में डाल दो।' सेठ ने देखा कि कमंडल में पहले ही कूड़ा-करकट भरा हुआ है। यह देखकर वह बोला, 'महाराज, यह हलवा मैं इसमें कैसे डाल सकता हूं। कमंडल में तो कूड़ा-करकट भरा हुआ है। इसमें हलवा डालने पर भला वह खाने योग्य कहां रह जाएगा, अपितु वह भी कूड़े-करकट के साथ मिलकर दूषित हो जाएगा।' यह सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, 'वत्स, तुम ठीक कहते हो। सबसे पहले पात्रता विकसित करो, तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे। यदि मन-मस्तिष्क में विकार तथा कुसंस्कार भरे हैं, तो वे आत्मज्ञान को आत्मसात कैसे कर पाएंगे? एकाग्रता भी तभी बनती है, जब व्यक्ति शुद्धता से कार्य करने का संकल्प करता है।' संत की बातें सुनकर धनिक सेठ ने उसी समय संकल्प लिया कि वह शुद्ध आचरण से तथा परोपकार के द्वारा पहले अपने को सुपात्र बनाएगा, ताकि उसे आत्मज्ञान सहजता से प्राप्त हो सके।

पत्थर की पूजा


संत नामदेव के जीवन से जुड़ी यह चर्चित कथा है। उनके पिता दामाशेट दर्जी थे। वह चाहते थे कि नामदेव उनका कारोबार आगे बढ़ाएं पर नामदेव तो दिन भर मंदिर में कीर्तन करते रहते थे। इससे दामाशेट दुखी रहते थे। एक दिन उन्होंने नामदेव को कपड़ों का एक गट्ठर सौंप दिया और कहा कि इसे वह बाजार में बेच आएं। नामदेव बाजार पहुंचे। वहां गट्ठर सामने रख विट्ठल के ध्यान में मग्न हो गए। सभी की कमाई हुई, पर नामदेव खाली ही रहे।

वहीं पास में खेत में कुछ पत्थर पड़े थे। उन्होंने पत्थरों को कपड़ों से ढक दिया और एक बड़े पत्थर से कहा कि आठ दिन बाद फिर आऊंगा, पैसे दे देना, ताकि पिता को हिसाब दे सकूं। पिता ने पूछा तो कहा कि आठ दिन बाद पैसे मिलेंगे। आठ दिन बाद नामदेव उस बड़े पत्थर के पास गए। पैसे मांगने लगे। पर वह कहां से देता! उन्होंने गुस्से में उसे उठाया और पंढरपुर के विट्ठल मंदिर ले आए। बोले- यहीं बापू को जवाब दे देना। दामाशेट बौखला रहे थे- कपड़ों के बदले पत्थर! नजदीक आकर देखा तो वह पूरा पत्थर सोने का हो गया था। यह समाचार सब ओर फैल गया।

स किसान के खेत का पत्थर था, वह आकर सोने का पत्थर मांगने लगा। नामदेव ने अपने कपड़े के पैसे मांगे व पत्थर उसे दे दिया। घर जाकर किसान ने देखा कि वह तो फिर पत्थर बन गया। वह गुस्से में नामदेव जी के घर वह पत्थर रख गया। आज भी उस पत्थर की पूजा नामदेव के मंदिर में होती 

दूसरे की गलती


एक बार गुरु श्यामानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढ़ाया। पढ़ाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले, 'अब तुम चारों इस पाठ का बार-बार अध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुम में से कोई बोले नहीं। थोड़ी देर बाद मैं तुमसे इस पाठ के बारे में बात करूंगा।' यह कहकर श्यामानंद वहां से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य अलग-अलग बैठकर पाठ का अध्ययन करने लगे।

अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना बन गई। यह देखकर एक शिष्य बोला, 'लगता है, तेज बारिश होगी।' यह सुनकर दूसरे ने कहा, 'तु?हें बोलना नहीं चाहिए था।' तभी तीसरा बोला, 'तुम लोगों ने बोलकर गुरुजी की आज्ञा भंग कर दी है।' चौथा शिष्य चुपचाप पाठ पढ़ता रहा। इसी बीच श्यामानंद वहां आ गए। उन्हें देखकर पहला शिष्य बोला, 'गुरुजी, यह मौन नहीं रहा और बोलने लगा।' दूसरा शिष्य बोल पड़ा, 'तो तुम कौन सा मौन थे। तुम भी तो बोल पड़े थे।' तीसरे ने कहा, 'इन दोनों ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी है।' यह सुनकर दोनों तपाक से बोले, 'तुम भी तो बोल ही पड़े थे।' मगर चौथा शिष्य अभी भी चुप था।

उसे देखकर गुरुजी बोले, 'तुम में से केवल इसने ही मेरी आज्ञा मानी। यह निश्चय ही आगे चलकर बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य करेगा क्योंकि इसके भीतर पर्याप्त धैर्य और एकाग्रता है। यह किसी के बहकावे में नहीं आता न ही किसी क्षणिक हलचल से विचलित होता है। तुम तीनों के भविष्य को लेकर मुझे शंका है क्योंकि तुम तीनों एक दूसरे का दोष निकालने के कारण स्वयं भी गलती कर बैठे। अधिकतर लोग ऐसा ही करते हैं। वे दूसरे को उसकी गलती बताने के चक्कर में स्वयं भी गलती कर बैठते हैं और फिर स्वयं कब गलत मार्ग पर चलने लगते हैं, इसका उन्हें आभास तक नहीं होता।' यह सुनकर तीनों शिष्यों का सिर शर्म से झुक गया।

संत का धन 1


उन दिनों विजय नगर में संत पुरंदर की ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। हर प्रकार के मोह-माया से मुक्त त्यागमूर्ति पुरंदर अपनी पत्नी के साथ नगर से बाहर एक कुटिया में रहते थे और भिक्षा मांग कर गुजारा करते थे। उनके नाम की चर्चा उड़ते-उड़ते राजा कृष्णदेव राय तक भी पहुंची। उन्हें लगा कि उन्हें संत के लिए कुछ करना चाहिए। एक दिन उन्होंने तेनालीराम से कहा- जाओ संत पुरंदर से कहो कि वे भिक्षा के लिए दर-दर न भटकें और केवल राजमहल से भिक्षा लिया करें। राजा ने इसी बहाने उनकी दरिदता दूर करने का उपय सोच लिया था। अब संत रोज राजमहल आने लगे।

उन्हें भिक्षा में अनाज के साथ छोटे-मोटे कीमती पत्थर भी दिए जाते थे। राजा को लगता था कि संत के पास जल्दी ही अच्छी-खासी संपत्ति जमा हो जाएगी। पर मन में सवाल भी उठता था कि आखिर ये कैसे संत हैं जो ये कीमती रत्न स्वीकार कर रहे हैं। कहीं ये संत होने का ढोंग तो नहीं कर रहे। एक दिन राजा और तेनालीराम भेस बदलकर संत की कुटिया में पहुंचे। राज को देखकर हैरत हुई कि संत की कुटिया में कोई बदलाव नहीं आया था। उनकी पत्नी चावल बीनते हुए बुदबुदा रही थीं कि पता नहीं कहां से कंकड़-पत्थर आ जाते हैं। राजा ने चावल हाथ में लेकर कहा-पर ये तो हीरे-मोती हैं। इनसे आपकी दरिदता दूर हो सकती थी। संत की पत्नी ने कहा-हमारे लिए तो ये कंकड़-पत्थर ही हैं। धन और विनम्रता ही हमारा धन है। यह सुनकर राजा लज्जित हो गए। उन्होंने संत और उनकी पत्नी से क्षमा मांगी

संत का धन


उन दिनों विजय नगर में संत पुरंदर की ख्याति बढ़ती ही जा रही थी। हर प्रकार के मोह-माया से मुक्त त्यागमूर्ति संत पुरंदर अपनी पत्नी के साथ नगर से बाहर एक कुटिया में रहते थे और भिक्षा मांग कर गुजारा करते थे। उनके नाम की चर्चा उड़ते-उड़ते राजा कृष्णदेव राय तक भी पहुंची। उन्हें लगा कि उन्हें संत के लिए कुछ करना चाहिए। एक दिन उन्होंने तेनालीराम से कहा- जाओ संत पुरंदर से कहो कि वे भिक्षा के लिए दर-दर न भटकें और केवल राजमहल से भिक्षा लिया करें। राजा ने इसी बहाने उनकी दरिद्रता दूर करने का उपय सोच लिया था।

अब संत रोज राजमहल आने लगे। उन्हें भिक्षा में अनाज के साथ छोटे-मोटे कीमती पत्थर भी दिए जाते थे। राजा को लगता था कि संत के पास जल्दी ही अच्छी-खासी संपत्ति जमा हो जाएगी। पर मन में सवाल भी उठता था कि आखिर ये कैसे संत हैं जो ये कीमती रत्न स्वीकार कर रहे हैं। कहीं ये संत होने का ढोंग तो नहीं कर रहे। एक दिन राजा और तेनालीराम भेस बदलकर संत की कुटिया में पहुंचे। राज को देखकर हैरत हुई कि संत की कुटिया में कोई बदलाव नहीं आया था।

उनकी पत्नी चावल बीनते हुए बुदबुदा रही थीं कि पता नहीं कहां से कंकड़-पत्थर आ जाते हैं। राजा ने चावल हाथ में लेकर कहा-पर ये तो हीरे-मोती हैं। इनसे आपकी दरिद्रता दूर हो सकती थी। संत की पत्नी ने कहा-हमारे लिए तो ये कंकड़-पत्थर ही हैं। धन और विनम्रता ही हमारा धन है। यह सुनकर राजा लज्जित हो गए। उन्होंने संत और उनकी पत्नी से क्षमा मांगी।

श्रम रहित परिश्रम


महर्षि वेदव्यास किसी नगर से गुजर रहे थे। उन्होंने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा। मन में सवाल उठा- एक छोटा सा कीड़ा इतनी तेजी से क्यों भागा जा रहा है? उन्होंने कीड़े से पूछा- ऐ क्षुद्र जंतु! तुम इतनी तेजी से कहां जा रहे हो? कीड़ा बोला- हे महर्षि, आप तो इतने ज्ञानी हैं, यहां क्षुद्र कौन और महान कौन? क्या इनकी सही-सही परिभाषा संभव है? महर्षि सकपकाए। फिर सवाल किया- अच्छा बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहां भागे जा रहे हो? इस पर कीड़े ने कहा-अरे! मैं तो अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा हूं। देख नहीं रहे कि पीछे कितनी तेजी से बैलगाड़ी चली आ रही है।

कीडे़ के उत्तर ने महर्षि को फिर चौंकाया। वह बोले- पर तुम तो इस कीट योनि में पड़े हो। यदि मर गए तो तुम्हें दूसरा और अच्छा शरीर मिलेगा। इस पर कीड़ा बोला- महर्षि! मैं तो कीड़े की योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूं, पर ऐसे प्राणी बहुत हैं जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया है, पर वे मुझ कीड़े से भी गया-गुजरा आचरण कर रहे हैं। महर्षि उस नन्हे से जीव के कथन पर सोचते रहे, फिर उन्होंने उससे कहा- चलो, हम तुम्हारी सहायता कर देते हैं। कीड़े ने पूछा- किस तरह की सहायता? महर्षि बोले-तुम्हें उठाकर मैं आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुंचा देता हूं। इस पर कीड़े ने कहा- धन्यवाद! श्रम रहित पराश्रित जीवन विकास के सारे द्वार बंद कर देता है। मुझे स्वयं ही संघर्ष करने दीजिए। महर्षि को कोई जवाब न सूझा।

सदाचार की परीक्षा


राजा अंग सिंह के पुत्र प्रवीण सिंह गलत संगति में पड़कर अनुचित कार्य करने लगा। चारों तरफ से उसकी शिकायतें आने लगीं। इससे राजा अत्यंत चिंतित हो गए। प्रवीण सिंह अभी बालक ही था, इसलिए राजा चाहते थे कि उसका स्वभाव बदले और भविष्य में वह एक नेक राजा बन सके।

वह उसे अपने गुरु सोमदेव के पास लेकर आए। सोमदेव ने युवराज को छह माह तक अपने आश्रम में छोड़ देने के लिए कहा। वह प्रतिदिन युवराज को अपने साथ रखते और उससे कई कार्य कराते। इसी तरह तीन महीने बीत गए। अब राजकुमार पर सुसंगति के साथ ही गुरुदेव की बातों का असर पड़ने लगा था।

एक दिन गुरु बोले, 'पुत्र, ईश्वर हर जगह मौजूद है। याद रखो दुष्कर्म और पाप की सजा मिलती अवश्य है क्योंकि ईश्वर सब कुछ देख रहा होता है। जब तुम किसी प्रलोभन से पाप करने को उतारू हो तो वहीं ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करो। तुम हर जगह यह सोचो कि मेरा प्रभु मेरे सामने है।'


वह ये बातें प्रतिदिन युवराज को बताते। एक दिन उन्होंने राजकुमार को एक खरगोश देकर उसे एकांत में ले जाकर मारने को कहा। युवराज खरगोश को लेकर कई स्थानों पर गया लेकिन उसकी गर्दन नहीं मरोड़ पाया। वह जब भी उसकी गर्दन पर हाथ रखता तो उसकी निरीह आंखों में उसे ईश्वर नजर आते। कई घंटों बाद वह वापस जीवित खरगोश को लेकर गुरु के पास पहुंचा और बोला, 'गुरु जी आप ही ने तो सिखाया है कि हर किसी में ईश्वर की उपस्थिति समझो। फिर मैं अकेला कैसे हो सकता हूं? इस खरगोश की भोली आंखों में मुझे ईश्वर की उपस्थिति नजर आई। इसलिए मैं इसे मार नहीं पाया।'

युवराज की बात सुनकर गुरु सोमदेव ने उसे गले से लगा लिया और बोले, 'पुत्र, आज तुम सदाचार और प्रेम की परीक्षा में पास हो गए हो।' इसके बाद महाराज उसे अपने साथ ले गए।

खजांची का वेतन

पंडित सदासुख जयपुर के राजा सवाई राम सिंह के खजांची थे। कुछ दरबारियों ने राजा से शिकायत की कि पंडित जी अपना काम ठीक से नहीं कर रहे। वह हर समय धर्मग्रंथ पढ़ते रहते हैं। कुछ दिनों के बाद राजा अचानक राजकीय खजाने के पास पहुंच गए। राजा ने देखा कि पंडित जी अपने काम में जुटे हुए हैं।

वहां सब कुछ व्यवस्थित था। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं थी। राजा प्रसन्न हुए। उन्होंने पंडित जी से कहा-सदासुख, तुम्हारे कार्य से मैं संतुष्ट हूं। मैं तुम्हें तरक्की देना चाहता हूं। मैं तुम्हारा वेतन एक चौथाई बढ़ाना चाहता हूं। इस पर सदासुख बोले- यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे कार्य से संतुष्ट हैं। मगर मैं चाहता हूं कि आप मेरा वेतन एक चौथाई कम कर दें। यह सुनकर राजा चकित हो गए। आज तक ऐसी विचित्र मांग किसी ने नहीं रखी थी। राजा ने कहा- सदासुख, तुम्हें क्या हो गया है? तुम ऐसी मांग क्यों कर रहे हो?

पंडित सदासुख ने कहा- महाराज, मैं प्रत्येक दिन एक घंटे देर से कार्यालय आना चाहता हूं क्योंकि मैं इन दिनों एक ग्रंथ लिख रहा हूं। इस पर राजा ने कहा-कोई बात नहीं। मैं तुम्हें देर से आने की अनुमति देता हूं। तुम्हारा वेतन कम नहीं होगा। सदासुख बोले-नहीं महाराज, यह अनुचित होगा। मैं कम काम के बदले अधिक वेतन नहीं ले सकता। इससे राज्य का नुकसान होगा। कृपया मेरे वेतन में एक चौथाई की कमी की जाए। राजा ने पंडित जी को गले से लगा लिया। पंडित जी का वेतन कम हो गया। उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की।

प्रतिभा और ज्ञान


एक संत को जंगल में एक नवजात शिशु मिला। वह उसे अपने घर जे आए। उन्होंने उसका नाम जीवक रखा। उन्होंने जीवक को अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्रदान की। जब वह बड़ा हुआ तो उसने संत से पूछा, 'गुरुजी, मेरे माता-पिता कौन हैं?' संत को जीवक के मुंह से यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन उन्होंने उसे सच बताने का निश्चय किया और बोले, 'पुत्र, तुम मुझे घने जंगलों में मिले थे। 

मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं और कहां हैं?' जीवक अत्यंत उदास होकर बोला, 'गुरुजी, अब आत्महीनता का भार लेकर मैं कहां जाऊं?' इस पर संत उसे सांत्वना देते हुए बोले, 'पुत्र, इस बात से दुखी होने के बजाय तुम तक्षशिला जाओ और वहां विद्याध्ययन करके अपने ज्ञान के प्रकाश से संपूर्ण समाज को आलोकित करो।' जीवक अध्ययन के लिए चल पड़ा। वहां पहुंचकर वहां के आचार्य को उसने अपने बारे में सब कुछ बता दिया। 

आचार्य ने उसकी स्पष्टवादिता से प्रभावित होकर उसे विश्वविद्यालय में प्रवेश दे दिया। जीवक वहां पर कठोर परिश्रम के साथ विद्या प्राप्त करने लगा। वहां उसने आयुर्वेदाचार्य की उपाधि प्राप्त की। संपूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के बाद एक दिन आचार्य जीवक से बोले, 'पुत्र, अब तुम मगध जाकर वहां के लोगों की सेवा करो।' यह सुनकर जीवक परेशान हो गया। आचार्य उसे दुखी देखकर बोले, 'कौन सी बात तुम्हें टीस रही है?' जीवक बोला, 'आचार्य, आप तो जानते ही हैं कि मेरा कोई कुल और गोत्र नहीं है। मैं जहां भी जाऊंगा, लोग मुझ पर उंगलियां उठाएंगे। क्या आप मुझे अपने पास ही नहीं रख सकते?' उसकी बात सुनकर आचार्य बोले, 'वत्स। तुम्हारी प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारा कुल-गोत्र है। इन्हीं से तुम्हें सम्मान मिलेगा।' आचार्य की बातों ने जीवक को नई दिशा दिखाई और वह मगध आ गया। वहां उसने लगन और मेहनत से काम किया। कुछ ही समय में वह पूरे मगध में आयुर्वेदाचार्य के रूप में प्रसिद्ध हो गया। 

संकल्प और साहस


खेल की कक्षा शुरू हुई तो एक दुबली-पतली अपंग लड़की किसी तरह अपनी जगह से उठी। वह खेलों के प्रति जिज्ञासा प्रकट करते हुए शिक्षक से ओलिंपिक रेकॉर्ड्स के बारे में सवाल पूछने लगी। इस पर सभी छात्र हंस पड़े। शिक्षक ने भी व्यंग्य किया- तुम खेलों के बारे में जानकर क्या करोगी। अपने ऊपर कभी नजर डाली है? तुम तो ठीक से खड़ी भी नहीं हो सकती, फिर ओलिंपिक से तुम्हें क्या मतलब है? तुम्हें कौन सा खेलना है जो यह सब जानोगी। चुपचाप बैठकर सुनो।

रुआंसी लड़की कुछ कह न सकी। सारी क्लास उस पर हंसती रही। अगले दिन जब खेल पीरियड में उसे बाकी बच्चों से अलग बिठाया गया तो उसने कुछ सोचकर बैसाखियां संभालीं और दृढ़ निश्चय के साथ बोली-सर याद रखिएगा। अगर लगन सच्ची हो और इरादे बुलंद हों तो सब कुछ संभव है। आप देखना एक दिन यही लड़की हवा से बातें करके दिखाएगी। उसकी इस बात से भी ठहाका गूंज उठा। सबने इसे मजाक के रूप में लिया। लेकिन वह लड़की तेज चलने के अभ्यास में जुट गई। वह अच्छी और पौष्टिक खुराक लेने लगी, फिर वह कुछ दिनों में दौड़ने भी लगी। कुछ दिनों के बाद उसने छोटी-मोटी दौड़ में भाग लेना भी शुरू कर दिया। उसे दौड़ते देख लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे। फिर कई लोग उसकी मदद को आगे आए। सबने उसका उत्साह बढ़ाया। उसके हौसले बुलंद होने लगे। फिर उसने 1960 के ओलिंपिक में हिस्सा लिया और तीन स्वर्ण पदक जीतकर सबको हतप्रभ कर दिया। ओलिंपिक में इतिहास रचने वाली वह थी अमेरिकी धाविका विल्मा रुडोल्फ।

कौन बने राजा


भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को पक्षियों का राजा माना गया है लेकिन वे अपने स्वामी की सेवा में इतना व्यस्त रहते थे कि उन्हें पक्षियों का हालचाल जानने का समय ही नहीं मिल पाता था। एक दिन पक्षियों ने अपनी सभा बुलाई और इस बात पर विचार-विमर्श किया कि ऐसे राजा का क्या लाभ, जो कभी हमें देखने तक नहीं आता।

सभी ने काफी सोच-विचार कर उल्लू को राजा घोषित कर दिया। उल्लू के राजतिलक की तैयारी होने लगी, तभी एक कोने में बैठे कौवे ने चिल्लाते हुए कहा कि यह फैसला हमें मंजूर नहीं है। राजा गरुड़ को भले ही हमारे पास आने का समय न मिलता हो, लेकिन जब भी मौका मिलेगा वह अवश्य आएंगे। मगर उल्लू को राजा बनाने का क्या लाभ, जिसे दिन में दिखाई ही नहीं पड़ता।

वह हमारी परेशानियों को कैसे हल करेगा। वह दूसरों की बातें सुनकर फैसला करेगा जिसका परिणाम यह होगा कि चाटुकारों का बोलबाला हो जाएगा। किसी ने तर्क दिया कि उल्लू रात में देख सकते हैं इसलिए वह रात में हमारी समस्या सुलझा देंगे। कौवे ने कहा- ऐसा राजा मुझे मंजूर नहीं जो रात में आकर हमारी नींद हराम करे। फिर हम पक्षी रात में ठीक से देख नहीं पाते। हम पहचानेंगे कैसे कि उल्लू ही आया है।

इस बात का लाभ उठाकर कोई राक्षस उसकी जगह आ सकता है और हमें मारकर खा सकता है। पक्षियों ने मान लिया कि राजा ऐसा होना चाहिए, जिसे प्रजा के दुख-दर्द दिखाई तो पड़ें। अंत में गरुड़ को ही राजा बनाए रखने का फैसला किया गया।

वैज्ञानिक बनने की चाह


किसी समय लंदन की एक बस्ती में एक अनाथ बालक रहता था। वह अखबार बेचकर किसी तरह अपना गुजारा करता था। कुछ समय बाद उसे एक जिल्दसाज की दुकान पर जिल्द चढ़ाने का काम मिल गया। उस बालक को पढ़ने का बहुत शौक था। वह पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाते समय महत्वपूर्ण बातें व जानकारियां पढ़ता रहता था। एक दिन जिल्द चढ़ाते समय उसकी नजर एक विद्युत संबंधी लेख पर पड़ी।

वह लेख उसे बहुत ही मनोरंजक लगा। उसने दुकान के मालिक से एक दिन के लिए वह पुस्तक मांग ली और रात भर में उस लेख के साथ ही पूरी पुस्तक भी पढ़ डाली। पुस्तक का उसके ऊपर गहरा असर पड़ा। इससे उसकी प्रयोग करने में जिज्ञासा बढ़ती गई और धीरे-धीरे वह अध्ययन एवं परीक्षण के लिए विद्युत संबंधी छोटी-मोटी चीजें इधर-उधर से जुटाने लगा। बालक की इस बारे में रुचि देखकर एक ग्राहक उससे बहुत प्रभावित हुआ। वह खुद भी विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखता था। एक दिन वह बालक को अपने साथ भौतिकशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान डेवी का भाषण सुनाने ले गया। बालक ने डेवी की बातें ध्यान से सुनीं और उन्हें नोट भी किया। इसके बाद बालक ने उनके भाषण की समीक्षा करते हुए अपने कुछ परामर्श लिखकर डेवी के पास भेज दिए।

डेवी को बालक की सलाह बहुत पसंद आई। उन्होंने उसे अपने यंत्र व्यवस्थित करने के लिए अपने पास रख लिया। बालक उनके साथ रहने लगा। वह उनके सहयोगी और नौकर दोनों की भूमिका निभाता रहा। वह दिन भर कामों में व्यस्त रहता, रात को अध्ययन करता। थकान होने पर भी उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी। वह भौतिकी के क्षेत्र में खासकर विद्युत के क्षेत्र में बहुत कुछ करना चाहता था। आखिरकार अपनी मेहनत और संकल्प से उसने अपना सपना पूरा किया। वह एक महान वैज्ञानिक बन गया। आज दुनिया उस बालक को माइकल फैराडे के नाम से जानती है।

मूर्तिकार का सपना


एक मूर्तिकार ने एक रात विचित्र स्वप्न देखा। वह किसी छायादार पेड़ के नीचे बैठा था। अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने उसे उठा लिया फिर उसे सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा- मुझे मत मारो। दूसरी बार वह रोने लगा। मूर्तिकार ने उसे छोड़ दिया। फिर उसने अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे तराशने लगा।

वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसमें से एक एक देवी की मूर्ती उभर आई। मूर्ति वहीं पेड़ के नीचे रख वह आगे चला गया। फिर कुछ समय बाद वह उसी पुराने रास्ते से गुजरा। उस स्थान पर पहुंचकर उसने देखा कि उस मूर्ति की पूजा-अर्चना हो रही है, जो उसने बनाई थी। भीड़ लगी है, भजन आरती हो रही है, भक्तों की पंक्तियां लगी हैं। जब उसके दर्शन का समय आया, तो पास आकर उसने देखा कि उसकी बनाई मूर्ति के सामने न जाने क्या-क्या रखा है। जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने, उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक ओर पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़ -फोड़ कर देवी की मूर्ति पर चढ़ा रहे है। तभी मूर्तिकार की नींद टूट गई। वह सपने के बारे में सोचने लगा।

उसने निष्कर्ष निकाला कि जो लोग थोड़ा कष्ट झेल लेते हैं, उनका जीवन बन जाता है। विश्व उनका सत्कार करता है। पर जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं, उनका सत्कार कोई नहीं करता।

दान का विज्ञापन


जमशेदजी मेहता कराची के प्रसिद्ध कारोबारी व समाजसेवी थे। एक बार उनके पास कराची के जन चिकित्सालय की संचालक समिति के सदस्य चंदा लेने के लिए आए। ये उस अस्पताल को बेहतर बनवाने के लिए लोगों से दान इकट्ठा कर रहे थे। उनमें से एक सदस्य मेहता जी से बोला, 'महोदय, हमारी प्रबंध समिति ने यह निर्णय लिया है कि जो दस हजार रुपये दान देगा उसका नाम अस्पताल के मुख्य द्वार पर लगने वाले शिलालेख पर लिखा जाएगा।'

उनकी बात सुनकर मेहता जी मुस्कराने लगे। उन्हें बैठने का संकेत कर उन्होंने अपनी तिजोरी से रुपये निकालकर सदस्यों के सामने रख दिए। सदस्य रुपये गिनने लगे। कुल नौ हजार नौ सौ पचास रुपये थे। सभी सदस्य हैरानी से एक दूसरे को देखने लगे। उन्हें लगा शायद मेहता जी उनकी बात नहीं समझ पाए या उन्होंने गलती से यह राशि दे दी है। तभी एक सदस्य थोड़ा सकुचाते हुए उनसे बोला, 'महोदय, आपके द्वारा नौ हजार नौ सौ पचास रुपये दिए गए हैं। यदि आप पचास रुपये और दे दें तो पूरे दस हजार हो जाएंगे। इस तरह अस्पताल के मुख्य द्वार के शिलालेख पर आपका नाम आ जाएगा।'

सदस्य की बात सुनकर मेहता जी विनम्रतापूर्वक बोले, 'मेरे लिए इतना दान ही उत्तम है। मैं पूरे दस हजार रुपये देकर अपने दान का विज्ञापन नहीं करवाना चाहता। विज्ञापन से दान का महत्व नष्ट हो जाता है। महत्व चिकित्सालय के उद्देश्य का रहना चाहिए, न कि दानदाता का। यदि दान प्रचारित किया जाता है तो निर्धन व्यक्तियों को त्याग और सेवा करने की प्रेरणा कैसे और कहां से मिलेगी? वे कम राशि देने में संकोच करेंगे। सच बात तो यह है कि नि:स्वार्थ सेवा में जो आनंद है, वैसा पत्थर पर नाम लिखवाने में नहीं।' सभी सदस्य उनकी बात सुनकर दंग रह गए। वे मन ही मन उनके उदार विचारों के कायल हो गए।

धर्म का आदर

स्वामी श्रद्धानंद महर्षि दयानंद के योग्य शिष्य थे। उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए देश के कई हिस्सों में गुरुकुल कांगड़ी और अन्य संस्थाओं की स्थापना की थी।

एक बार रुड़की चर्च के पादरी फादर विलियम ने स्वामी जी से पत्र लिखकर कहा- स्वामी जी, मुझे लगता है कि अगर मैं हिंदी सीख लूं तो शायद भारत में मैं अपने धर्म का प्रचार बेहतर ढंग से कर पाऊंगा। क्या इसके लिए आप मुझे अपने गुरुकुल में प्रवेश दे सकते हैं? मैं वादा करता हूं कि अपने अध्ययन के दौरान मैं ईसाई धर्म की चर्चा नहीं करूंगा और उसके प्रचार की कोई कोशिश नहीं करूंगा।

स्वामी जी ने पत्र के जवाब में लिखा- फादर, गुरुकुल कांगड़ी में आपका खुले दिल से स्वागत है। आप यहां अतिथि बनकर हमारी सेवाएं ले सकते हैं। मगर आपको एक वचन देना होगा। जब तक आप यहां रहेंगे तब तक आप अपने धर्म का खुलकर प्रचार-प्रसार करेंगे ताकि हमारे छात्र भी ईसा मसीह के उपदेशों को समझ सकें और उन्हें ग्रहण कर सकें। मैं चाहता हूं कि हमारे छात्र धर्मों का आदर करना सीखें। धर्म प्रेम सिखाता है बैर नहीं। हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह अपने अलावा दूसरे धर्मों को भी जाने। अधिक से अधिक धर्मों के विषय में जानकर हम एक अच्छे इंसान बन सकते हैं।

स्वामी जी का यह जवाब पढ़कर फादर अभिभूत हो गए। वे जब तक गुरुकुल में रहे, छात्रों को ईसाई धर्म के बारे में बताते रहे। यहां रहकर भारतीयों को लेकर उनकी कई धारणाएं बदल गईं। वे जीवन भर गुरुकुल के लिए कार्य करते रहे।