Friday, 12 July 2013

बापू का गुस्सा


उन दिनों गांधीजी चंपारण में थे। एक सुबह वह अपनी कुटिया के बाहर बैठकर चरखा कात रहे थे। उनके सामने दो बच्चे खेलते-खेलते एकाएक लड़ने लगे। वे दोनों इतने उत्तेजित हो गए कि एक-दूसरे को भद्दी-भद्दी गालियां देने लगे।

उन छोटे बच्चों के मुंह से गालियां सुनकर गांधीजी को बेहद अफसोस हुआ। उन्होंने आसपास के लोगों से उन दोनों के मां-बाप के बारे में पता किया। फिर उन्होंने एक दिन उनके मां-पिता को बुला भेजा। वे लोग यह जानकर आश्चर्यचकित भी हुए और खुश भी कि उन्हें बापू ने बुलाया है। वे गांधीजी के पास पहुंचे। उन्होंने उन्हें प्रणाम किया। गांधीजी ने उन्हें डांटना शुरू कर दिया।

बच्चों के मां-बाप घबराए। वे सिर झुकाए, खामोशी से सब कुछ सुनते रहे। लेकिन एक बच्चे के पिता से रहा नहीं गया। उसने पूछा- बापू क्षमा करें। हम समझ नहीं पा रहे कि हमसे क्या गलती हो गई है? गांधीजी ने स्थिति स्पष्ट की- सुनो। तुम लोगों के बच्चे यहां खेल रहे थे। अचानक उनमें झगड़ा हो गया और वे एक-दूसरे को गाली देने लगे। इस पर उस व्यक्ति ने कहा- लेकिन इसके लिए आपने हमें क्यों बुलाया? आप उन्हें बुलाकर डांट देते। आपको उन्हें डांटने का पूरा अधिकार है।

गांधीजी बोले- देखो। मैं उन्हें डांट सकता था। पर तब न जब वे दोषी होते। ये गालियां उन्होंने तुम लोगों से ही सीखी होंगी। या कहीं और किसी से भी सीखी हो तो तुम लोगों ने उन्हें सुधारने की कोशिश नहीं की। इसलिए दोषी तुम लोग हुए। डांट तुम्हें पड़नी चाहिए। यह सुनकर बच्चों के अभिभावकों ने सिर झुका लिया।

सादगी और निष्ठा



मोतीहारी में गांधीजी कार्यकर्ताओं को निर्देश दे रहे थे- 'आज अवंतिका आने वाली होगी, उसे स्टेशन से लिवा लाना और कमरे में ठहरा देना।' एक ने कहा-'बापू उसे इन साधारण कमरों में चटाई पर सोना क्यों पसंद होगा? वह तो पहले दरजे में सफर की आदी है'। बापू ने कहा-'वह जनसेवक के तौर पर आ रही है। जनसेवक के अनुरूप अगर तीसरे दरजे में आई तो उसे यहीं रखूंगा, वरना वापस भेज दूंगा।' 'पर बापू ....' दूसरे ने संकोच में कहा-'उनके पास पैसा है, वह भी उन्हीं का कमाया हुआ।

उसे खर्च करने में क्या बुराई है? खर्च का मतलब अपव्यय तो नहीं।' स्वयं सेवक गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी के साथ आवंतिका बाई को लेने स्टेशन गए। देवदास ही अकेले उन्हें पहचानते थे। देवदास ने उम्मीद के मुताबिक उन्हें दूसरे दरजे के डिब्बों में खोजा, लेकिन कहीं पता न चला। तब वे निराश होकर वापस आ गए और खबर दी कि अवंतिका बाई इस गाड़ी से नहीं आईं। यह सुनकर सब लोग हंसने लगे। दरअसल अवंतिका अपने पति के साथ पहले ही एक साधारण कमरे में ठहर चुकी थीं। यात्रा उन्होंने तीसरे दर्जे में की थी और बापू की कसौटी पर खुद को खरा साबित किया।

शाम को गांधीजी उन्हें समझाने लगे- किस तरह बड़हखा गांव जाकर काम शुरू करना करना है। इस पर कस्तूरबा ने कहा- 'ये आज ही आए हैं और कल दीवाली है। दीवाली मनाकर जाएं।' 'नहीं ऐसा नहीं होगा, इन्हें कल सुबह ही निकलना होगा।' गांधीजी का स्वर तेज था। ''एक दिन में क्या हो जाएगा?' 'जनसेवक को निठल्ले नहीं बैठना है।' तभी अवंतिका बोलीं- 'बापू, आप मुझे यह बताएं कि बड़हखा के कायाकल्प के लिए मुझे क्या करना है।' गांव की समस्याओं का तो वहीं जाकर अध्ययन करना होगा और गांव वालों का विश्वास जीतना होगा।' 'और विश्वास जीतने के लिए क्या करना होगा?' 'सादगी और निष्ठा का पालन ही तुम्हें विश्वस्त बनाएगा। जनसेवक की यही संपत्ति है। यह सुनकर आवंतिका बाई तैयारी में जुट गईं।

एक चित्र के बहाने


यह उन दिनों की बात है, जब प्रख्यात कलाकार माइकल एंजेलो की पूरे यूरोप में चर्चा हो रही थी। उसकी लोकप्रियता देख कर एक चित्रकार उससे ईर्ष्या करता था। सोचता था, लोग मेरा गुणगान क्यों नहीं करते? क्या मैं खराब चित्रकार हूं? क्यों न मैं एक ऐसा चित्र बनाऊं, जिसे देख कर लोग माइकल एंजेलो को भूल जाएं और मैं ही उनकी जुबान पर चढ़ जाऊं।

उसने एक स्त्री का चित्र बनाना शुरू किया। जब चित्र पूरा हो गया तो उसकी सुंदरता का परीक्षण करने चित्र को दूर से देखने लगा। उसमें उसे कुछ कमी लगी। लेकिन कमी क्या थी, समझ में नहीं आई। संयोग से उसी समय माइकल एंजेलो उस तरफ से जा रहा था। उसकी नजर चित्र पर पड़ी। उसे चित्र बहुत सुंदर लगा। पर उसे उसकी कमी समझ में आ गई। उसने उस चित्रकार से कहा, 'भाई, तुम्हारा चित्र तो बहुत सुंदर है। पर इसमें जो कमी रह गई है वो आंखों में खटक रही है।'

चित्रकार ने माइकल एंजेलो को कभी देखा नहीं था। उसने सोचा, यह कोई कला कला प्रेमी होगा। चित्रकार ने एंजेलो से कहा, 'कमी तो मुझे भी लग रही है।' एंजेलो ने कहा, 'क्या आप अपनी कूची देंगे? मैं कोशिश करता हूं।' कूची मिलते ही एंजेलो ने चित्र में बनी दोनों आंखों में काली बिंदियां बना दीं। बिंदियों का लगना था कि चित्र सजीव हो बोलता नजर आने लगा। चित्रकार ने एंजेलो से कहा, 'धन्य है! तुमने सोने में सुगंध का काम कर दिया। मेरे चित्र की शोभा बढ़ाने वाले तुम हो कौन? क्या नाम है ?' एंजेलो ने कहा, 'मेरा नाम माइकल एंजेलो है।'

चित्रकार के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वह बोला, 'भाई, क्षमा करें। आपकी उन्नति देख मैं जलता था। आपको हराने के लिए ही मैंने यह चित्र बनाया था। लेकिन आज आपकी कला-प्रवीणता और सज्जनता देख कर मैं शर्मिंदा अनुभव कर रहा हूं।' माइकल एंजेलो ने उसे अपना दोस्त बना लिया।

गुरु का पाठ

गंगा के किनारे बने एक आश्रम में महर्षि मुद्गल अपने अनेक शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। उन दिनों वहां मात्र दो शिष्य अध्ययन कर रहे थे। दोनों काफी परिश्रमी थे। वे गुरु का बहुत आदर करते थे। महर्षि उनके प्रति समान रूप से स्नेह रखते थे। आखिर वह समय भी आया, जब दोनों अपने-अपने विषय के पारंगत विद्वान बन गए। मगर इस कारण दोनों में अहंकार आ गया। वे स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ समझने लगे।


एक दिन महर्षि स्नान कर पहुंचे तो देखा कि अभी आश्रम की सफाई भी नहीं हुई है और दोनों शिष्य सोकर भी नहीं उठे हैं। उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि ऐसा पहले कभी नहीं होता था। महर्षि ने जब दोनों को जगाकर सफाई करने को कहा तो दोनों एक-दूसरे को सफाई का आदेश देने लगे। एक बोला-मैं पूर्ण विद्वान हूं। सफाई करना मेरा काम नहीं है। इस पर दूसरे ने जवाब दिया-मैं अपने विषय का विशेषज्ञ हूं। मुझे भी यह सब शोभा नहीं देता। महर्षि दोनों की बातें सुन रहे थे। उन्होंने कहा- ठीक कह रहे हो तुम लोग। तुम दोनों बहुत बड़े विद्वान हो और श्रेष्ठ भी। यह कार्य तुम दोनों के लिए उचित नहीं है। यह कार्य मेरे लिए ही ठीक है। उन्होंने झाड़ू उठाया और सफाई करने लगे। यह देखते ही दोनों शिष्य मारे शर्म के पानी-पानी हो गए। गुरु की विनम्रता के आगे उनका अहंकार पिघल गया। उनमें से एक ने आकर गुरु से झाड़ू ले लिया और दूसरा भी उसके साथ सफाई के काम में जुट गया। उस दिन से उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया।

चौथी पत्नी देगी साथ

वह अपनी चौथी पत्नी से बहुत प्रेम करता है और उसका सबसे ज्यादा ख्याल रखता है। वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्रेम करता है और हमेशा अपने दोस्तों को उससे ही मिलवाता है, हालांकि उसे इस बात का भी हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं उसकी तीसरी बीवी किसी और के साथ न चली जाए। वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्रेम करता है। उसे जब भी कोई परेशानी होती है तो वह उसी के पास जाता है और उसकी पत्नी हर बार उसकी परेशानियों को हल करने में मदद करती है।

लेकिन अपनी पहली पत्नी से वह प्रेम नहीं करता, जबकि उसकी पहली पत्नी उससे बहुत प्रेम करती है और उसके प्रति वफादार है। वह उसका पूरा ख्याल रखती है। एक दिन वह आदमी बहुत बीमार पड़ गया, उसे लगने लगा कि वह जल्द ही मरने वाला है। उसने सोचा - मेरे पास चार बीवियां हैं। मेरी मृत्यु के बाद उनमें से एक में अपने साथ ले जाऊंगा जिससे कि मैं अपने आप को अकेला महसूस न करूं।

उसने अपनी चौथी पत्नी से पूछा कि क्या वह उसके साथ मर सकती है। 'कतई नहीं' पत्नी ने जवाब दिया और ऐसा कहकर वहां से चली गई।


उसने अपनी तीसरी पत्नी से वही सवाल पूछ। तीसरी पत्नी ने कहा- 'यहां का जीवन बहुत बढ़िया है। तुम्हारे मरने के बाद में दूसरी शादी कर लूंगी। '

इसके बाद उसने अपनी दूसरी पत्नी से पूछा। उसने भी साफ-साफ कह दिया कि 'मुझे माफ करना। इस बार मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती। मैं सिर्फ अंत्येष्टि तक तुम्हारा साथ दे सकती हूं।'

यह सब सुनने के बाद उसका मन भारी हो गया और उसका शरीर ठंडा पड़ गया। तभी एक आवाज आई- 'मैं चलूंगी तुम्हारे साथ। मैं चलूंगी तुम्हारे पीछे-पीछे। तुम चाहे कहीं भी जाओ।' उस आदमी ने सिर उठाकर देखा तो उसकी पहली पत्नी वहां खड़ी थी। वह बहुत ही कमजोर थी। ऐसा लग रहा था जैसे कुपोषण का शिकार हो। उसे देखकर वह आदमी बहुत दुखी होकर बोला-' मुझे तुम्हारा ज्यादा ख्याल रखना चाहिए था।'

दरअसल, हम सभी के जीवन में चार पत्नियां होती हैं:

- चौथी पत्नी हमारा शरीर है। हमने अपने शरीर को सुंदर बनाने के लिए उस पर कितना भी खर्च किया हो, मृत्यु के बाद वह हमारा साथ नहीं देता।

- तीसरी पत्नी हमारा अधिकार, रुतबा और धन है। मृत्यु के बाद यह किसी और के पास चली जाती है।

- दूसरी पत्नी हमारे दोस्त और परिजन हैं जो हमारा अंत समय तक साथ देते हैं, लेकिन मौत के बाद हमारे साथ नहीं जाते।

- पहली पत्नी हमारी आत्मा है जिसकी हम हमेशा उपेक्षा करते रहते हैं। यही एक ऐसी चीज है जो हमारा हर समय साथ देती है।

प्रतिभा की पहचान


यूनान के किसी गांव का एक लड़का लकड़ियां काटकर गुजारा करता था। वह दिन भर जंगल में लकड़ियां काटता और शाम को पास के शहर के बाजार में उन्हें बेच देता था। एक दिन एक विद्वान व्यक्ति बाजार से जा रहा था। उसकी नजर बालक के गट्ठर पर पड़ी जो बेहद कलात्मक ढंग से बंधा था। उसने उस लड़के से पूछा- क्या यह गट्ठर तुमने खुद बांधा है? लड़के ने जवाब दिया- जी हां, मैं दिन भर लकड़ी काटता हूं, स्वयं गट्ठर बांधता हूं और रोज शाम को बाजार में बेच देता हूं। उस व्यक्ति ने कहा- क्या तुम इसे खोलकर इसी प्रकार दोबारा बांध सकते हो? लड़के ने गट्ठर खोला तथा बड़े ही सुंदर तरीके से उसे फिर बांध दिया। यह कार्य वह बड़े ध्यान, लगन और फुर्ती के साथ कर रहा था।

लड़के की एकाग्रता, लगन तथा कलात्मक रीति से काम करने के तरीके ने उस व्यक्ति को काफी प्रभावित किया। उसे बच्चे में काफी संभावना नजर आई। उसने पूछा- क्या तुम मेरे साथ चलोगे? मैं तुम्हें अपने साथ रखूंगा, शिक्षा दिलाऊंगा। तुम्हारा सारा खर्चा मैं उठाऊंगा। बालक ने सोच-विचार कर अपनी स्वीकृति दे दी और उसके साथ चला गया। उस व्यक्ति ने बालक के रहने और उसकी शिक्षा का प्रबंध किया। वह स्वयं भी उसे पढ़ाता था और नई-नई बातें सिखाता था। थोड़े ही समय में उस बालक ने उच्च शिक्षा हासिल की और काफी कुछ ज्ञान अर्जित कर लिया। बड़ा होने पर यह बालक यूनान के महान दार्शनिक पाइथागोरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ। और जिस व्यक्ति ने उसे अपने यहां रखा था वह था यूनान का विख्यात तत्व ज्ञानी डेमोक्रीट्स।

इंजिनियर की सूझबूझ

फिलीपींस में एक इंजिनियर एक बांध के निर्माण में पूरी लगन और ईमानदारी से जुटा हुआ था। वहां मौजूद अन्य कर्मचारी भी इस बात को महसूस कर रहे थे। वे अक्सर उसके काम करने के तरीके के बारे में बातें करते रहते थे। एक दिन यह खबर फिलीपींस के तत्कालीन राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे तक पहुंची कि उपयुक्त सामग्री विदेश से सही समय पर नहीं पहुंच पाई लेकिन इसके बावजूद एक इंजिनियर पूरे समर्पण के साथ बांध को निश्चित अवधि में पूरा करने में लगा हुआ है।

वह दिन-रात वहां रहकर स्वयं बांध के निर्माण कार्य में लगा हुआ है। यह सुनकर एक दिन राष्ट्रपति बांध देखने निर्माण-स्थल पर जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि सचमुच निर्माण कार्य अत्यंत तेजी व सक्षमता से हो रहा है और मुख्य इंजिनियर खुद सामान्य मजदूर की भांति काम में सक्रिय है।

विदेश से समय पर पंप न पहुंच सकने के कारण पुराने अमेरिकी डीजल ट्रकों का प्रयोग करते देखकर राष्ट्रपति अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने इंजिनियर को बुलाया और बोले, 'पंपों की जगह आप डीजल ट्रकों का प्रयोग कर रहे हैं...। कहीं इससे कुछ हुआ तो आप जवाबदेही लेंगे?'


इंजिनियर ने बिना किसी संकोच के कहा, 'जी महोदय।' इंजिनियर का मनोबल और उत्साह देखकर राष्ट्रपति गदगद हो गए और बोले, 'अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाओ।' इंजिनियर यह सुनकर हैरत में पड़ गया। उसने डरते-डरते अपना हाथ ऊपर उठा दिया।

राष्ट्रपति मधुर मुस्कान के साथ उसे शाबाशी देते हुए बोले, 'काम के प्रति आपकी लगन, सूझबूझ और वफादारी से प्रभावित होकर मैं आपको निर्माण विभाग के उपसचिव पद की शपथ अभी और यहीं दिलवाता हूं।' इंजिनियर की खुशी का ठिकाना न रहा।

वहां उपस्थित दूसरे कर्मचारियों ने ताली बजाकर राष्ट्रपति के फैसले का समर्थन किया। सबने स्वीकार किया कि उस इंजिनियर को बिल्कुल सही पुरस्कार दिया गया है। निर्माण विभाग के उपसचिव के रूप में उस इंजिनियर ने प्रशंसनीय कार्य किए